एक ग़ज़ल:
गांव भीतर से घुना है दोस्तो,
शहर लोहे का चना है दोस्तो।
उस महल के द्वार पर दस्तक न दो,
वह सियासत से बना है दोस्तो।
जो हमारा ही लहू पीता रहा,
वह हमारा सरगना है दोस्तो।
रीढ़ की हड्डी नहीं गिरवी रखी,
इसलिए यह सर तना है दोस्तो।
- चन्द्रमणि त्रिपाठी







