कभी किसी पेड़ को गिरते देखा है
घने जंगलों में उस जगह
जहां वह काटा जाता है
हलचल मची होती है
जो दबे होते हैं, उसके तले
वे घबड़ाते नहीं…
हौले से अंकुर बन फिर बाहर निकल आते हैं
वैसे ही जब किसी घर का मुखिया गिर जाता है
खड़े खड़े धड़ाम से
वहां भी हलचल मच जाती है
यहां सब घबड़ाते हैं
हिस्सेदारी के लिए
बर्तन के लिए
दीवारों के लिए
जंगल की तरह ये फिर से नहीं पनपते
बेलों की तरह उलझ जाते हैं
फिर से किसी बड़े पेड़ से नहीं लिपटते
ये बड़े तो होते जाते हैं
पर कभी पेड़ नहीं बन पाते…।
– नीरज की वॉल से







