व्यंग्य: सैनिटाइजर का गंगाजल बनना

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अंशुमाली रस्तोगी
दिन में कितनी दफा अपने हाथों को ‘सैनिटाइज’ कर लिया करता हूं, मुझे खुद नहीं पता। सैनिटाइज करने के बाद लगता है, मैं ‘पवित्र’-सा हो गया! इन दिनों पूरी दुनिया ही ‘पवित्रता का चोला’ ओढ़े हुए है। कहीं जाओ या किसी को बुलाओ अगला पहले हाथों को सैनिटाइज करने को बोलता है। सोचता हूं, जब इतना सैनिटाइज करने के बाद हम 29 लाख पार पहुंच गए, जो न किया होता तब क्या हाल होता? अजी, हाल-वाल कुछ नहीं होता, लोगों की जिंदगी ऐसे ही कट रही होती, मस्त। मन में आया तो मास्क चढ़ा लिया, वरना कोई बात नहीं। बाजारों में भीड़ बेइंतहा है। सोशल डिस्टेंसिंग सुनने और अखबारों में पढ़ने में बहुत अच्छा लगता है, परंतु जब इससे सामना होता है, होश फाख्ता हो जाते हैं। सैनिटाइजर तो हमारे लिए ‘भ्रम’ मात्र है, बाकी हमसे बड़ा ‘खलीफा’ दुनिया में कोई नहीं। हम ईश्वर से नहीं डरते, कोरोना से क्या खाक डरेंगे! अब कोरोना भी मुझे ‘भ्रम’-सा लगने लगा है।
अक्सर शादियों में मुफ्त का खाना देख जैसे हम ‘टूट’ पड़ते हैं, इन दिनों सैनिटाइजर की शीशी देखकर हमारा हाल वही होता है। सैनिटाइजर कहीं रखा मिल जाए फिर तो लोग चाहते हैं उसी वक़्त उससे नहा लें। वो तो ‘खतरा’ पीने में है अगर न होता तो शायद पी भी लेते। आलम यह है, जिस घर में सैनिटाइजर नहीं, उसे हम ‘हेय दृष्टि’ से देखने लगे हैं। पूछते हैं उससे कि आप सैनिटाइजर क्यों नहीं रखते? मतलब यहां भी धौंस!
कोरोना फुर्सत में कभी न कभी सोचता अवश्य होगा कि मैं हिंदुस्तान आकर गलत फंस गया। यहां लोग मुझे सिरियसली लेते ही नहीं। मेरी इज्जत नहीं करते। मुझे कहीं भी, कभी भी दुत्कार देते हैं। सरकार, प्रशासन, पुलिस कह रही है- भइया मास्क पहन लो। लेकिन नहीं, भइया कहने-समझाने वाले पर ही चौड़े हो जाते हैं। तो, कुछ ऐसे भी हैं कि हाथ धो-धोकर पड़ोसी तक का टैंक खाली किए दे रहे हैं। इतना सैनिटाइज करते हैं कि कभी-कभी डर-सा लगता है, नक्शेबाजी में कहीं पी-पा न लें। साधु, भांति-भांति के लोग।
‘आपदा में अवसर’ खोजने वालो ने सैनिटाइजर का मजबूत बाजार बना लिया है। क्या मिठाई, क्या परचूनी, क्या दूध-दही की दुकान हर जगह सैनिटाइजर दबाकर बिक रहा है। शीशी में अगर ‘नीला शर्बत’ घोलकर रख दिया जाए तो लोग उसे भी सैनिटाइजर समझ खरीद लेंगे। सैनिटाइजर ने बहुतों को ‘आत्मनिर्भर’ बना दिया है इस मुल्क में। लोकल में वोकल हुए जा रहे हैं सब।
मन में विचार है कि नौकरी छोड़कर क्यों न मोहल्ले में सैनिटाइजर की दुकान खोल लूं! मौका देखकर चौक मारने में कोई हर्ज नहीं। क्या पता सैनिटाइजर बेचते-बेचते एक दिन मैं खुद की ‘सैनिटाइजर कंपनी’ खड़ी कर लूं। किस्मत और लोटे को पलटते देर नहीं लगती पियारे। कल को यह भी हो सकता है कि मैं अपनी कंपनी का शेयर भी लिस्ट करवा लूं, एक्सचेंज में। फिर तो ठाठ ही ठाठ होंगे मेरे। कुछ ही दिनों में ‘सैनिटाइजर किंग’ कहलाया जाने लगूंगा मुल्क में।
लुत्फ यह है, जिन्हें कल तक सैनिटाइजर की इस्पेलिंग भी न आती थी, आज वे सैनिटाइजर पर हर कहीं ज्ञान फेंकते हुए दिख-मिल जाते हैं। सैनिटाइजर से कोरोना कितना पस्त हुआ, मैं नहीं जानता, पर कमाई का अच्छा जरिया बन चुका है। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा; शायद इसी को कहते हैं।
रात-दिन सैनिटाइजर पर फोकस कर रहा हूं। पूरी दुनिया मुझे सैनिटाइजर में घुली-धुली नजर आ रही है। लोग उधार मांगकर सैनिटाइजर ले रहे हैं। अन्न की जगह सैनिटाइजर ने ले ली है। कल को हो सकता है कोई ऐसा ‘चमत्कारी सैनिटाइजर’ बाजार में आ जाए, जिसे आटे-सब्जी में मिलाया जा सके। नोट तो सैनिटाइज हो ही रहे हैं, हो सकता है, वोट भी सैनिटाइज होकर पड़ने लगे। सैनिटाइज नेता देश में पैदा होने लगें।
कोरोना काल निपटने के बाद दुनिया कितनी बदलेगी कह नहीं सकता पर सैनिटाइजर लोगों की जिंदगी से ‘जौंक’ की तरह चिपक जाएगा। पूरा विश्व ही सैनिटाइजर की नदी में गोते लगाने लगेगा। हर ओर ‘पवित्रता’ बिखरी पड़ी होगी। सैनिटाइजर ‘गंगाजल’ सरीखा बन जाएगा।

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