अंशुमान खरे
फटे मे पैर डालने की लाचारी अपन की बचपन से ही थी। टांग अड़ाना तो जन्म सिद्ध अधिकार था।बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि पैदा होते ही नर्स के बाल नोचने का रिकार्ड बनाया। पता नहीं गिनीज बुक मे मामला दर्ज हुआ या नहीं। बचपन मे घर की दीवारों पर आड़ी तिरछी लाइन खींच कर पेंटिंग बनाने पर हमेशा कान खीचें गए। कोशिश होती थी कि घर पर कोई कागज सादा न रहे। पेंटिंग का शौक पैदाइशी था।
एक खबर ने तो हमारा दिमाग ही खराब कर दिया। एक मोहतरमा ने एक पेंटिंग अपनी कह कर किसी को दो करोड़ मे चिपका दी। मोहतरमा नामी गिरानी पेंटर रही होंगी। मालूम नहीं पेंटिंग मे क्या हीरे मोती जड़े थे। उसके बाद तो पेंटिंग बनाने वालों की सुनामी सी आ गई। जिसे देखो वही पेंटिंग बनाने मे लगा है। सब को दो करोड़ दिख रहे थे। अच्छे भले लोगो मे पेंटिंग का भूत सवार हो गया।अच्छा भला आदमी पेंटिंग बनाने मे यूं मशगूल हो गया जैसे पेंटिंग ही सब कुछ है। घर परिवार, पूजा पाठ,सोना जगना सब भूलकर बस हाय पेंटिंग हाय पेंटिंग करने लगे। हमारे पड़ोसी चुपचाप एक पेंटिंग बनाकर दो करोड़ वसूलने बाजार मे निकल लिए। पुलिस वाले खरीदने की कौन कहे, पुलिसिया तरीके उनकी खूब आवभगत की। अब वह बैठना चाहते हैं तो बैठ नहीं पा रहे हैं। खड़े रहने मे भी टांगें लड़खड़ाने लगती हैं। पेंटिंग को सीने से लगाए बदहवास से दौड़भाग कर रहे हैं। कोई तो खरीदार पेंटिंग का प्रेमी होगा जो करोड़ दो करोड़ मे पेंटिंग खरीद लेगा।
देखते देखते हरघर मे पेंटिंग का नया दौर शुरु हो गया। मैं भी क्यों पीछे रहूं। एक पेंटिंग लेकर उत्साह से निकला। पेंटिंग लेकर चौराहे पर जम गया। लोगों ने भिखारी समझकर सिक्कों की बौछार कर दी। मैं कुछ समझ पाता उससे पहले ही स्थानीय पुलिस हरकत मे आ गई। पेंटिंग सहित दबोच लिया। हड़काया कि यहां पर भीख मागना सख्त मना है। थाने ले गए बड़ी सेवा की। पेंटिंग के चिथड़े हो गए। न हंसते बन रहा था न रोते। कभी मैं अपने को देखता कभी पेंटिंग के चिथड़ों को। पुलिस ने हड़काया अलग, फिर ऐसा किया तो हाथ पांव तोड़कर रख देंगे। इतना होने के बाद भी पेंटिंग और दो करोड़ मन मे उथलपुथल कर रहे थे। आव देखा न ताव इन्कलाब जिंदाबाद का नारा लगाने लगा। आखिर मेरा दोष क्या है। अगर मोहतरमा की पेंटिंग दो करोड़ मे बिक सकती है तो मेरी क्यों नहीं। अरे दो करोड़ न सही कोई एक करोड़ मे ही खरीद ले। सोचकर मन अन्दर ही अन्दर हिचकोले लेने लगा।
पुलिस की सेवा आवभगत से पोर पोर दुख रहा था। पर पेंटिंग का खरीददार न मिलने से मन खिन्न हो गया। कबाड़ीवाला बार बार घर के चक्कर लगा रहा था। दस रुपए किलो का आफर दे रहा था। जले पर नमक छिड़क रहा था। कहा दो करोड़, कहा दस रुपए किलो। मन करोड़ की बात सोच सोचकर उत्साहित था। आज नहीं तो कल लोगों को पेंटिंग का महत्त्व समझ आएगा। दुनिया पहले बड़े बड़ों को घास नहीं डालती।बाद मे सत्कार और पुरस्कारों की झड़ी लगा देती है।
मैने भी उत्साह मे पेंटिंग पर पेंटिंग बनाकर घर भर दिया। देखते हैं कब तक लोग हमारी पेंटिंग पर ध्यान नहीं देते। मैं पेंटिंग लेकर बैठा हूं, एक न एक दिन दुनिया को मेरी पेंटिंग के आगे झुकना पड़ेगा, और मेरी पेंटिंग की सराहना करनी पड़ेगी। सपने मे ही सही कोई खरीददार मिलेगा जरूर।दोस्तों ने उलाहना देकर आग मे घी डालने का काम किया। ये पेंटिंग नहीं लोगों का ज़मीर बिक रहा है। पेंटिंग के खरीदार और पेंटर का ये रिश्ता क्या कहलाता है,भगवान जाने। मैं भी हाथपर हाथ धरकर बैठने वाला नहीं हूं।इस विश्वास के साथ पेंटिंग लेकर बैठा हूं कि कभी न कभी अपने और पेंटिंग के दिन बहुरेंगे। आमीन।







