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    सोनम वांगचुक की लंबी हिरासत और भारतीय लोकतंत्र की असली परीक्षा

    ShagunBy ShagunFebruary 25, 2026 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    Sonam Wangchuk's long detention and the real test of Indian democracy
    सोनम वांगचुक की लंबी हिरासत और भारतीय लोकतंत्र की असली परीक्षा
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    आलोक बाजपेयी, ( लेखक स्वतंत्र पत्रकार और इकोनॉमिक्स में रिसर्च स्कॉलर हैं )

    सोनम वांगचुक एक प्रसिद्ध इंजीनियर, इनोवेटर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। वे लद्दाख के लोगों के लिए बहुत बड़े नाम हैं। लेकिन 26 सितंबर 2025 से उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत जेल में रखा गया है। अभी वे जोधपुर सेंट्रल जेल में हैं। उनकी हिरासत अब लगभग 150 दिन यानी करीब पांच महीने हो चुकी है।

    19 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी हिरासत के खिलाफ याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने सरकार से उनके भाषणों की असली रिकॉर्डिंग और सही अनुवाद मांगे। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की आजादी का नहीं है। यह पूरे भारत के लोकतंत्र की जांच है। क्या हम असहमति को अपराध मानने लगे हैं? क्या शांतिपूर्ण विरोध को जेल में डालना सही है? यह सवाल हम सबके लिए हैं।

    लोकतंत्र में असहमति का अधिकार

    लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी राय रखने और सरकार से सवाल करने का हक है। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है। यह सिर्फ सरकार की तारीफ करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी गलतियों को बताने के लिए भी है।

    सोनम वांगचुक ने जीवन भर शिक्षा, पर्यावरण और लद्दाख के विकास के लिए काम किया। उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला है, जो एशिया का बड़ा सम्मान है। उन्होंने गलवान में देशभक्ति दिखाई। हिमालय की रक्षा के लिए कई बार भूख हड़ताल की। लाखों लोगों को प्रेरित किया। फिर भी उन्हें NSA जैसे सख्त कानून में डाल दिया गया।

    जब ऐसे व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखा जाता है, तो समाज में डर फैलता है। लोग सोचते हैं कि सरकार की आलोचना करने पर जेल हो सकती है। इससे स्व-संयम (सेल्फ-सेंसरशिप) बढ़ता है। असहमति अपराध नहीं है। यह लोकतंत्र की जान है।Sonam Wangchuk's long detention and the real test of Indian democracy

    NSA का गलत इस्तेमाल

    NSA एक रोकथाम वाला कानून है। इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति देश की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है, तो बिना मुकदमा चले उसे हिरासत में रखा जा सकता है। लेकिन इसे बार-बार राजनीतिक विरोध दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

    यह बहुत खतरनाक है। NSA जैसे विशेष कानून सिर्फ बहुत गंभीर मामलों में इस्तेमाल होने चाहिए। अगर हर असहमति को राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा मान लिया जाए, तो अभिव्यक्ति की आजादी खत्म हो जाएगी। लोकतंत्र कमजोर पड़ जाएगा।

    क्या है लद्दाख की अनसुनी मांगें

    लद्दाख एक खास इलाका है। यहां की भूगोल, संस्कृति और सुरक्षा अलग है। लोग चाहते हैं:

    • छठी अनुसूची का दर्जा (जो आदिवासी इलाकों को विशेष सुरक्षा देता है)
    • पूर्ण राज्य का दर्जा
    • स्थानीय लोगों को नौकरियों में प्राथमिकता
    • पर्यावरण की रक्षा

    सोनम वांगचुक ने इन मांगों को उठाया। उनकी लड़ाई 2024 में शुरू हुई, जब उन्होंने लेह में 20 दिन भूख हड़ताल की। मांग थी:

    लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करें, पर्यावरण संरक्षित क्षेत्र घोषित करें, युवाओं को रोजगार दें और संस्कृति-भाषा बचाएं।

    लेकिन इन मांगों को सुना नहीं गया। इसके बजाय विरोध को दबाने की कोशिश हुई। सितंबर 2025 में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसमें कुछ लोगों की मौत हुई। सरकार ने सोनम वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया और NSA लगा दिया।

    जेल में रखने से समस्या हल नहीं होती। लद्दाख सीमा पर है, यहां की भावनाओं को दबाना ठीक नहीं। बातचीत से समाधान निकालना चाहिए।

    स्वास्थ्य और मानवता की चिंता

    सोनम वांगचुक 50 साल से ज्यादा उम्र के हैं। उन्हें कुछ पुरानी बीमारियां हैं। पहले भूख हड़ताल की वजह से स्वास्थ्य खराब हुआ था। जेल में गंदा पानी और खराब हालात से उन्हें AIIMS जोधपुर में भर्ती होना पड़ा।

    सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी सेहत पर चिंता जताई। क्या एक ऐसे व्यक्ति को इतने लंबे समय तक बिना मुकदमे के रखना जरूरी है? यह मानवता के खिलाफ नहीं है क्या? जेल की हालतें और लंबी हिरासत स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।Sonam Wangchuk's long detention and the real test of Indian democracy

    शांतिपूर्ण विरोध और गांधीवादी रास्ता

    सोनम वांगचुक हमेशा शांतिपूर्ण तरीके अपनाते हैं। गांधीजी की तरह भूख हड़ताल और मार्च करते हैं। लेह से दिल्ली तक पैदल यात्रा की। हिंसा में विश्वास नहीं।

    फिर भी उन पर NSA लगा दिया गया। क्या गैर-हिंसक विरोध करने वाले को ऐसे सख्त कानून से दंडित करना लोकतंत्र के मूल्यों से मेल खाता है? वे सिर्फ राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त इनोवेटर हैं।

    उनका आइस स्टूपा तकनीक बहुत प्रसिद्ध है। यह ग्लेशियर पिघलने से पानी की कमी को सस्ते तरीके से हल करता है। उनकी लड़ाई लद्दाख के पर्यावरण को बचाने की है, जो पूरे भारत के लिए महत्वपूर्ण है। हिमालय की सुरक्षा देश की सुरक्षा है।

    उनकी जेल मतलब पर्यावरण की आवाज कमजोर होना।

    सुप्रीम कोर्ट क्या कर रहा है?

    कोर्ट ने सरकार से स्पष्ट सबूत मांगे। क्या हिरासत के लिए पर्याप्त आधार हैं? वीडियो रिकॉर्डिंग और अनुवाद की जांच हो रही है। कोर्ट ने कहा कि पुरानी कहावत है – न्याय में देरी मतलब न्याय से इनकार।

    सोनम वांगचुक की लड़ाई सिर्फ लद्दाख के लिए नहीं। यह अभिव्यक्ति की आजादी और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की लड़ाई है।

    समाज को क्या करना चाहिए?

    यह समय है कि हम सोचें। क्या हम विकास के नाम पर पर्यावरण रक्षकों को जेल में डाल देंगे? लोकतंत्र संस्थाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता से बचता है।

    याद रखें हमें अभिव्यक्ति, संवाद और सहनशीलता का समर्थन करना चाहिए। केंद्र सरकार को सोनम वांगचुक को तुरंत रिहा करना चाहिए। गलती सुधारना अभी भी संभव है। लद्दाख के साथ बातचीत की मेज पर बैठना देश की एकता और सम्मान के लिए अच्छा होगा।

    Shagun

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