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    Home»धर्म»Spirituality

    जानिए… चौदह वर्ष तक लक्ष्मण जी क्यों नहीं सोए?

    By April 1, 2018Updated:April 1, 2018 Spirituality No Comments3 Mins Read
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    लक्ष्मण जी का बड़ा त्याग: वैसे तो लक्ष्मणजी के चरित्र के बारे में रामायण में कई जगह उल्लेख मिलता है। लेकिन एक कथा यह भी प्रचलित है कि एक बार महर्षि अगस्त्य श्रीराम की सभा में आए। राम ने लंका के युद्ध की चर्चा करते हुए उनसे कहा कि मैंने रावण, कुंभकर्ण को रणभूमि में मार गिराया था तथा लक्ष्मण ने इंद्रजीत और अतिकाय का वध किया था। तब महर्षि बोले कि हे राम! इंद्रजीत लंका का सबसे बड़ा वीर था। वह इंद्र को बांध कर लंका ले आया था। फिर ब्रह्माजी आकर इंद्र को मांग ले गए। इंद्रजीत बादलों की ओट में रहकर युद्ध करता था। लक्ष्मण ने उसका वध किया तो लक्ष्मणजी के समान त्रिभुवन में कोई वीर नहीं है।

    Image result for god lakshmanयह सुनकर श्रीराम बोले कि मुनिवर यह आप क्या कह रहे हैं? महावीर कुंभकर्ण और रावण को पराजित करना मुश्किल काम था? तब महर्षि अगस्त्य बोले कि इंद्रजीत को वरदान था कि जो व्यक्ति चौदह वर्ष तक नहीं सोया हो, न ही इन वर्षों में किसी स्त्री का मुख देखा हो और न इन वर्षों में भोजन किया हो ऐसा व्यक्ति ही इंद्रजीत को मार सकता था। तब श्रीराम बोले कि मुनिवर आपका कहना ठीक है। लेकिन हम चौदह वर्ष तक साथ रहे, पर लक्ष्मण सोए नहीं? इस बात पर कैसे विश्वास किया जाए? तब श्रीराम ने सभा बुलाई, जिसमें लक्ष्मणजी भी आमंत्रित थे। लक्ष्मणजी से जब यह बात पूछी गई कि आप चौदह वर्ष तक सोए नहीं, क्या तुमने अन्न नहीं खाया? तो लक्ष्मणजी ने कहा कि जब रावण, माता सीता जी का हरण करके ले गया, तब हम माता सीता जी को खोजते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे।

    वहां सुग्रीव ने माता सीता के आभूषण दिखाए, लेकिन मैं उनके नुपूर ही पहचान पाया, क्योंकि मैंने उन्हें चौदह वर्षों तक देखा ही नहीं था, उनसे बात करते समय मेरी निगाह सिर्फ माता के चरणों पर रहती थी। जब आप और माता सीता कुटिया में रहते थे, तो मैं बाहर पहरा देता था। जब मुझे नींद आती तो मैं अपने बाणों से आंखों को कष्ट पहुंचाता ताकि नींद न आए। इस तरह में चौदह वर्ष तक जागता रहा। मैं अन्न इसलिए नहीं खाता था, क्योंकि मैं जंगल में जाकर फल लाता था और आप उनके तीन भाग करते थे। आपने कभी मुझसे उन्हें खाने के लिए नहीं कहा, आपकी आज्ञा के बिना मैं अन्न कैसे खा सकता था। अत: चौदह वर्ष से सभी फल मेरे पास सुरक्षित रखे हुए हैं।

    तब उन्होंने फल लाने का आदेश हनुमान जी को दिया। फलों के बारे में सुनकर हनुमानजी को अहंकार हो गया कि इन फलों को मैं आसानी से ला सकता हूं। जब वह फल लेने गए तो उसकी टोकरी को हिला भी नहीं पाए। उन्होंने सभा में आकर श्रीराम जी से कहा कि प्रभु में उन फलों की टोकरी को हिला भी नहीं पा रहा हूं। तब श्रीराम ने लक्ष्मणजी को फल लाने का आदेश दिया और उनसे पूरे फल गिनकर लाने को कहा। फलों की गिनती में सात दिनों के फल कम निकले। श्रीराम ने पूछा, ‘तो सात दिनों के फल तुमने खा लिए थे।

    लक्ष्मण जी बोले, नहीं प्रभु, दरअसल जिस दिन पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर हम वियोग में रहे उन दिनों हम विश्वामित्र आश्रम में निराहार रहे। जिस दिन में इंद्रजीत के नागपाश में बंधा था, उस दिन फल नहीं लाया था। जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी थी, उस दिन भी मैं फल नहीं ला सका। जिस दिन रावण की मृत्यु का अपार हर्ष था, उस दिन भी मैं फल नहीं लाया था। यह सब कुछ सुनकर भगवान श्रीराम ने अपने आज्ञाकारी और अतुल्य अनुज को गले लगा लिया।

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