आज का वह समाज जो तकनीकी चमत्कारों से चकाचौंध है, वह रिश्तों की मूलभूत नींव को धीरे-धीरे खोता जा रहा है। एक ओर जहां वैश्वीकरण और व्यक्तिवाद ने स्वतंत्रता का नया दौर ला दिया है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक बंधनों की गरिमा पर सवाल उठ रहे हैं। कानपुर के नौबस्ता का यह दर्दनाक मामला जहां बजरंग भदौरिया ने अपनी पत्नी लक्षिता सिंह को सरकारी शिक्षिका बनाने के लिए कर्ज लेकर कोचिंग का खर्च उठाया, और नौकरी लगते ही उन्हें एक करोड़ रुपये की शर्त पर रिश्ता तोड़ने की धमकी मिली केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक विघटन का प्रतिबिंब है।
यह कहानी न केवल एक व्यक्ति के विश्वासघात की है, बल्कि पूरे वैवाहिक संस्थान की क्षीण होती पवित्रता की भी। भारतीय संदर्भ में विवाह कभी ‘सात फेरे’ का पवित्र बंधन था, जहां दंपत्ति न केवल एक-दूसरे के, बल्कि परिवारों के साझा भागीदार बनते थे। लेकिन आधुनिक भारत में यह संस्था तेजी से बदल रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े बताते हैं कि तलाक की दर शहरी क्षेत्रों में 20% से अधिक हो चुकी है, जो 1990 के दशक की तुलना में दोगुनी है।

कारण? आर्थिक स्वावलंबन, शहरीकरण और सोशल मीडिया का प्रभाव। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार ने उन्हें सशक्त तो बनाया है, लेकिन कई मामलों में यह सशक्तिकरण स्वार्थी अपेक्षाओं में बदल गया है। लक्षिता जैसी कहानियां जहां पत्नी नौकरी के बाद ‘हैसियत’ की दुहाई देकर रिश्ता तोड़ने की धमकी देती है सोशल मीडिया पर भी गूंज रही हैं। हाल ही में एक पोस्ट में पवन सिंह की पत्नी द्वारा 30 करोड़ की ‘एलिमनी’ मांग की अफवाह ने बहस छेड़ दी: “शादियां प्यार के लिए नहीं, पैसों के लिए होंगी।”
यह ध्रुवीकरण रिश्तों को लेन-देन का बाजार बना रहा है। समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है; पुरुष भी इसमें फंस रहे हैं। शामली का सलमान मामला देखिए, जहां पत्नी खुशनुमा के बार-बार भागने के बावजूद पति ने रिश्ता न छोड़ने का फैसला लिया, और अंततः परिवार समेत आत्महत्या कर ली।
यहां प्यार की अंधी आस्था ने जीवन नष्ट कर दिया। आंकड़े चिंताजनक हैं: भारत में विवाह-बाहरी संबंधों और लिव-इन रिलेशनशिप की संख्या 2011 से 2021 के बीच 300% बढ़ी है, खासकर महानगरों में।
वैश्विकरण ने ‘लव मैरिज’ को बढ़ावा दिया, लेकिन पारंपरिक ‘अरेंज्ड मैरिज’ की 93% हिस्सेदारी अभी भी बरकरार है फिर भी, दोनों में ही विश्वास की कमी साफ दिखती है।
देखा जाये तो व्यक्ति अब साथी को ‘साथी’ कम, ‘सुविधा’ अधिक मानने लगे हैं। दहेज उत्पीड़न के कानूनों का दुरुपयोग, जहां पुरुषों को फंसाने की धमकियां आम हो गई हैं, ने रिश्तों में भय का वातावरण पैदा कर दिया है। यह संकट सामाजिक संरचना को हिला रहा है। परिवार, जो कभी रिश्तों का आधार था, अब टूटते बंधनों का साक्षी बन रहा है। बच्चों पर इसका असर सबसे घातक है टूटे घरों में पलने वाली पीढ़ी भावनात्मक रूप से असुरक्षित हो रही है। आर्थिक दबाव, कार्य-जीवन संतुलन की कमी और उपभोक्तावादी संस्कृति ने रिश्तों को ‘ट्रांजेक्शनल’ बना दिया है। लेकिन क्या यह अपरिहार्य है? नहीं।
समस्या का मूल व्यक्तिगत विकल्पों में नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों की उपेक्षा में है।समाधान की दिशा में कदम उठाने होंगे। शिक्षा प्रणाली में रिश्तों की शिक्षा अनिवार्य हो न केवल यौन शिक्षा, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता और पारस्परिक सम्मान पर जोर। कानूनी सुधार जरूरी हैं: दहेज कानूनों में संतुलन लाएं, ताकि न्याय सबके लिए हो, न कि हथियार।
मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदार बनाएं, जहां ‘वायरल ड्रामा’ की जगह सकारात्मक रोल मॉडल्स को बढ़ावा मिले। और सबसे महत्वपूर्ण, परिवारों को संवाद का केंद्र बनाएं शादी से पहले काउंसलिंग अनिवार्य हो, जहां अपेक्षाएं स्पष्ट हों।रिश्ते कभी संपत्ति नहीं होते; वे विश्वास की जड़ें हैं। कानपुर का बजरंग या शामली का सलमान ये नाम भूल जाएंगे, लेकिन अगर हमने समय रहते नहीं सुधारा, तो पूरी पीढ़ी के रिश्ते खत्म हो जाएंगे। विवाह का संस्कार तभी बचेगा, जब हम इसे प्यार और जिम्मेदारी का प्रतीक बनाएंगे, न कि सौदेबाजी का। समाज को अब चुनना होगा: टूटन या पुनर्निर्माण? समय तेजी से निकल रहा है।







