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    सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित है कसौंधन वैश्यों का इतिहास!

    ShagunBy ShagunApril 25, 2025Updated:April 25, 2025 MP No Comments3 Mins Read
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    बाएं से राम प्रताप गुप्ता, नव निर्वाचित राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री बागेश्वर कसौंधन वैश्य समाज, एवं राजेश गुप्ता और दाएं उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष के पी गुप्ता
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    राहुल गुप्ता, सीनियर कॉपी एडिटर

    इंदौर। श्री बागेश्वर कसौंधन वैश्य समाज की राष्ट्रीय कार्यकारणी के द्वितीय शपथ ग्रहण समारोह में भारत के कई प्रदेशों से कसौंधन वैश्य समाज के लोग एकत्रित हुए। उत्तर प्रदेश से आए श्री बागेश्वर कसौधन वैश्य समाज के नव निर्वाचित राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामप्रताप गुप्ता, उत्तर प्रदेश अध्यक्ष के पी गुप्ता ने कसौंधन वैश्य समाज के इतिहास के बारे में जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि यह शोध का विषय भी हो सकता है। उन्होंने बताया कि कसौंधन वैश्य समाज संभवतः कांस्य युगीन सभ्यता से संबंधित है।

    विश्व की सबसे प्राचीन विकसित और नगरीय सभ्यता सिंधु घाटी की सभ्यता है, जिसे कांस्य युगीन सभ्यता भी कहा जाता है। ज्ञात इतिहास के अनुसार उस काल में व्यापारी, कृषक और श्रमिक ही होते थे, जो बिना भेदभाव के साथ रहते थे। सेना और युद्ध का कोई जिक्र इस सभ्यता के इतिहास में नहीं है।

    https://shagunnewsindia.com/people-of-kasodhan-vaishya-community-gathered-from-across-the-country-in-indore/

    शांति, संयम और नियमों के साथ व्यापार, कृषि और श्रम से संबंधित कार्य थे। व्यापारी सीधे साधे क्यों होते हैं? लड़ाई झगड़े से दूर क्यों रहते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर लगभग सात हजार साल पहले की इस प्राचीन नगरीय सभ्यता, व्यापारी सभ्यता से मिलते हैं। इन्हीं पूर्वजों के शांति और संयम वाले जींस हम व्यापारियों को मिले हैं। शायद इस कारण ही व्यापारी आज भी शांति पसंद माना जाता है।

    कांसा उस युग की महान धातु रही इसी वजह से सिंधु घाटी सभ्यता को कांस्य युगीन सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। उस समय के अधिकांश व्यापारी कांसे को भी धन जैसा महत्व देकर उसे संचित करते थे। इस कारण ऐसे व्यापारी कालांतर में कसौंधन कहलाए।
    सिंधु घाटी या हड़प्पा सभ्यता का उत्तरी हिस्सा कश्मीर भी था, जहां कसौंधन वैश्यों का जमाव बहुतायत में हो गया। हड़प्पा सभ्यता के अंतिम दौर में रावी और सिंधु नदी के किनारे के स्थल पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो चुके थे लेकिन जम्मू काश्मीर में मांडा नदी के किनारे विकसित हो बनिहाल दर्रे के जरिए कश्मीर के अन्य क्षेत्रों में लोग व्यापार के लिए फैले। यह बनिहाल दर्रा और ऐसे बहुत से नाम जो व्यापारियों से संबंधित रहा काश्मीर राज्य में वा उसके इतिहास में देखने और पढ़ने को मिल जाते हैं।

    कश्मीर कश्यप ऋषि जी का भी स्थान रहा, और वही हमारे प्रथम पूर्वज और हमारे गोत्र भी हैं। मुगल काल में आक्रांताओं के चलते हमारे समाज के आराध्य देव बागेश्वर जी की मूर्ति को बचाने के लिए कसौंधन समाज के लोगों को काश्मीर से पलायन करना पड़ा। कई दिनों के भ्रमण में कई लोग बिछड़ते भी गए। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के सायर गांव में रात्रि विश्राम के बाद जब सुबह श्री शिव बागेश्वर जी की जब मूर्ति किसी से नहीं उठी तो लोगों ने यहां मूर्ति स्थापित कर मंदिर का निर्माण किया और इसी के आस पास के इलाकों में रहना शुरू किया। फिर यहीं से अन्य क्षेत्रों में भी धीरे धीरे फैलाव हुआ।

    श्री बागेश्वर कसौंधन वैश्य समाज का यह संगठन समाज की प्रगति और सेवा के लिए बना है और बाखूबी अपना दायित्व भी निभा रहा है। हम सबको भी समाज की प्रगति के लिए संवेदनाओं के साथ क्रियाशील रहने की जरूरत है।

    Shagun

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