छत्तीसगढ़ के एक सुनसान खेत में ठंडी नवंबर की रात थी। सूखी घास पर एक नवजात बच्ची अकेली पड़ी थी – न माँ की गोद, न कोई चादर, सिर्फ़ ठिठुरती ठंड और मौत का सन्नाटा। कोई इंसान आया था, बच्ची को वहीं छोड़ गया था। लेकिन उसी खेत में एक बेजुबान माँ अपने पिल्लों के साथ लेटी थी। उसने बच्ची की रोने की हल्की-सी आवाज़ सुनी।
वह धीरे से पास आई, उसे सूंघा, समझा और फिर जो किया। उसने सारी इंसानियत को झुकाकर सलाम कर दिया।
उसने उस नन्ही बच्ची को अपने बच्चों के बीच लिटाया, अपने शरीर से चिपकाया और पूरी रात उसे अपनी गर्मी देती रही।
सुबह जब लोग पहुंचे तो देखकर अवाक रह गए –
इंसान ने त्याग दिया था, एक बेजुबान माँ ने ममता की छाँव दे दी।आज यह तस्वीर हर तरफ़ है।
और हर कोई यही लिख रहा है,

ऐजब कौसर ने लिखा: “कभी-कभी इंसानियत के सबसे गहरे सबक हमें इंसानों से नहीं, जानवरों से मिलते हैं।
उस बेजुबान माँ ने बिना एक शब्द बोले वो कर दिखाया जो हज़ार भाषण नहीं सिखा पाते।”
अंशु सैनी ने लिखा:“उस बेजुबान माँ ने सच में इंसानियत की मिसाल कायम कर दी।”
आयशा खान ने लिखा: “इंसान ने फेंका, बेजुबान माँ ने गोद में ले लिया। ममता और वफ़ादारी कभी-कभी इन बेजुबानों के दिल में ही ज़्यादा बसती है।”हमें नहीं पता कि बच्ची को छोड़ने की मजबूरी क्या थी। लेकिन जो भी थी, उस रात एक बेजुबान माँ ने बता दिया कि ममता का कोई धर्म नहीं, कोई भाषा नहीं होती।
वह बस दिल में होती है। आज बच्ची अस्पताल में है, सुरक्षित है। उम्मीद है उसे प्यार भरा घर मिलेगा। और उस बेजुबान माँ को भी कोई ऐसा आशियाना मिले जहाँ उसकी इस ममता की कद्र हो, जहाँ उसे कभी भूखा न सोना पड़े।
दुआ कीजिए। उस नन्ही जान के लिए।
और उस बेजुबान माँ के लिए। क्योंकि आज उसने साबित कर दिया –
माँ बनने के लिए नौ महीने गर्भ में रखना ज़रूरी नहीं,
बस एक पल में किसी की जान बचाकर उसे अपनी गर्मी दे देना काफी है। वह बेजुबान माँ आज हम सबकी माँ बन गई। अब यह पढ़ते हुए सच में आँखें भर आती हैं, और “कुतिया” वाला कोई खटकता हुआ अहसास बिल्कुल नहीं रह जाता।






