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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    विश्व का सबसे बड़ा खतरा : ट्रंप

    ShagunBy ShagunMarch 29, 2026Updated:March 29, 2026 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    अरविन्द त्रिपाठी

    यह युद्ध नहीं, “धधकते अहंकार” की भीषण ज्वाला है। यह किसी जमीन पर कब्जे से ज्यादा, एक-दूसरे को समाप्त कर देने की जंग है। यह अस्तित्व को पूरी तरह मिटा देने की जिद और अपने अस्तित्व को बचाने की प्रतिज्ञा की जंग है। इस युद्ध में ईरान द्वारा इजराइल को पूरी तरह खत्मकर देने की जिद है, तो इजराइल द्वारा ऐसा चाहने वाले “ईरानी नेतृत्व” का नामोनिशान मिटा देने का संकल्प है।

    पहले ऐसा नहीं था। 1948 में इजराइल की स्वतंत्रता को सबसे पहले ईरान ने ही मान्यता दी थी। वर्ष 1979 तक ईरान और इजराइल में गहरी दोस्ती थी। दोनों एक-दूसरे के सहयोगी थे। दोनों के बीच हंसी-खुशी आपसी व्यापार आदि होता था। लेकिन ईरान में 1979 में हुई इस्लामी क्रांति के बाद सबकुछ बदल गया। ईरान एक इस्लामी गणराज्य बन गया। वहां का शासन धर्मतांत्रिक और सर्वोच्च नेता धार्मिक इमाम (अयातुल्लाह) हो गए। शीर्ष धार्मिक नेता अयातुल्लाह खोमैनी और उनके पुत्र ख़ामनेई ने पूरी यहूदी कौम को “शैतान” घोषित करते हुए कहा – धरती पर यहूदियों को रहने का हक नहीं। यह जमीन से यहूदियों को मिटा देने की कट्टर सोच थी। बदले में इजराइल कहता है – ऐसी मंशा रखने वाले किसी “नेतृत्व” को जिंदा रहने का हक नहीं।

    अरब-इजराइल संघर्ष पश्चिम एशिया में इजराइल की स्थापना के बाद से जारी राजनीतिक और सैन्य टकराव है। यह मुख्य रूप से “यहूदी मातृभूमि” (जायोनीवाद) और अरब राष्ट्रवाद के बीच भूमि और मान्यता का विवाद है। जायोनिस्ट, फिलिस्तीनी क्षेत्र को यहूदियों की पैतृक मातृभूमि मानते हैं, जबकि अरबी इसे फिलिस्तीनी भूमि और अरब जगत का एक अनिवार्य हिस्सा मानते हैं।

    14 मई 1948 को इजराइल ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपने वजूद की घोषणा की। तो, पड़ोसी अरब देशों (मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, इराक, लेबनान) ने इजराइल पर हमला कर दिया। इसके बाद अरब-इजरायल के बीच क्रमशः 1956, 1967 और 1973 में तीन और बड़े युद्ध हुए। हर युद्ध में इजराइल ने अरब शक्तियों को परास्त कर वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी, सिनाई और गोलन हाइट्स (पूर्व निर्धारित क्षेत्रों से 50 प्रतिशत अधिक भूमि) पर कब्जा कर लिया। अरब-इजरायल संघर्ष के “मूल में” मुख्य रूप से फिलिस्तीनी क्षेत्र पर दावे का ही विवाद है।

    “मुस्लिम उम्मा” (वैश्विक मुस्लिम समुदाय) फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के हिमायती हैं लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों को ताख़ पर रखकर नहीं। अमेरिका की मध्यस्थता में कुछ अरब देशों (यूएई, बहरीन, सूडान, मोरक्को) और इजराइल के बीच परस्पर राजनयिक संबंधों को सामान्य करने के लिए 2020 में “अब्राहम शांति समझौता” हुआ। यह 1994 में इजराइल और अरब देश ‘जॉर्डन’ के बीच हुए समझौते के बाद पहला बड़ा समझौता है। जॉर्डन-इजराइल शांति समझौता – एक-दूसरे की संप्रभुता को मान्यता देता है, उनकी अंतरराष्ट्रीय सीमा स्थापित करता है और सुरक्षा तथा आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देता है।

    Iran-US Conflict

    समय के साथ कड़वाहट कम होने के संकेत मिलने लगे थे लेकिन, ईरान सबसे अलग बना रहा। इजराइल पर लगातार हमला करते रहने के लिए उसने हमास, हूती और हिजबुल्ला जैसे कट्टर और खूंखार संगठनों को खड़ा किया। उन्हें एक से बढ़कर एक हथियारों से लैश किया। अपने इन्हीं प्रॉक्सी गुटों से ईरान, इजराइल को लगातार घाव देता आ रहा है। बदले में इजरायल भी भीषण पलटवार करने में पीछे नहीं है। जिस दिन इजराइल के पलटवार की क्षमता नष्ट हो जाएगी, उसी दिन इजराइल भी नष्ट हो जाएगा।

    वस्तुतः अरब-इजराइल के बीच सबसे गहरी खाई अमेरिका ही है। खाड़ी देशों को अपने नियंत्रण में रखने और उन पर दबदबा बनाए रखने के लिए उसे उन्हीं के बीच एक ऐसे देश की जरूरत थी, जिसका अरब देशों से दुराव हो। वह देश इजराइल है। ध्यान रहे अमेरिका, इजराइल को भारी सैन्य साजो-समान देने के बाद भी उसका हितैषी नहीं है। अन्यथा इजराइल को सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करने के लिए वह उसे “नाटो” में शामिल करवा सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया है। दूसरी तरफ वह अरब देशों का भी हितैषी नहीं।Khamenei's assassination: India's silence and the world's morality questioned

    वर्तमान युद्ध से कुछ पहले इजराइल ने अमेरिकी दोस्त “कतर” पर मिसाइल दागा लेकिन अमेरिका ने “सॉरी-वारी” कहकर सब रफ़ादफा कर दिया। वर्तमान युद्ध में अमेरिकी सुरक्षा छतरी के नीचे रहने वाले सभी अरब देशों पर ईरान मिसाइलों की बौछार कर रहा है। अरब देश, अपनी जान बचाने के लिए अमेरिका की ओर देख रहे हैं। लेकिन ट्रंप या तो मुंह से गाज फेंकने वाली जुगाली (पागुर) कर रहे हैं या फिर मसखरेबाज बंदर की तरह गुलाटी मार रहे हैं।…. विडंबना देखिए, इस सब के बावजूद भी अमेरिका अरब देशों और इजराइल दोनों को एक दूसरे के खिलाफ हथियार बेचकर भारी रकम कमाता है और दोनों का खैरख्वाह भी है।

    इंसानियत को ठोकर मारकर, कदम-कदम पर लाभ-हानि देखते हुए व्यवहार करने वाला व्यक्ति अंततः खुद अपने तथा पूरे समाज के लिए कितना घातक और विषैला होता है? डोनाल्ड ट्रंप से सटीक कोई दूसरी मिसाल नहीं।

    जनवरी 2025 में दोबारा राष्ट्रपति बनने पर दुनिया ने उन्हें एक “महाशक्ति के महानायक” रूप में देखा था। बाहुबली के रूप में। लेकिन सवा साल गुजरते-गुजरते दुनिया अपनी समझ पर माथा पीट रही है। जिसे उसने महानायक समझा था, वह तो विश्व की सुख, शांति का सबसे बड़ा खलनायक साबित हो रहा है। दुनिया जिसे सभ्यता का सर्वोच्च झंडाबरदार समझ रही थी, वह तो बेंजुएला के राष्ट्रपति का अपहरणकर्ता है। दुनिया की निगाह में जो “बाहुबली” था फारस की खाड़ी (ईरान) में उजागर हो गया कि वह तो “शेर की खाल ओढ़े सियार” भर है।Iran's Move That Shocked America: Missiles Change the Entire Game

    ध्यान रहे, ऐसे “विक्षिप्त” व्यापारी से विश्व के संपूर्ण तानेबाने को खतरा है। उसके चरित्र पर विश्व ही नहीं, अमेरिका को भी भरोसा नहीं। छानकर आती खबरें हैं कि उन्हें दोबारा राष्ट्रपति चुनने पर पछताती अमेरिकी जनता “हारे हुए जुआरी की तरह” सिर्फ अपना हाथ मल रही है।

    इतिहास में अनेक उद्योगपतियों के नाम शासनाध्यक्ष के रूप में दर्ज हैं। लेकिन ऐसे लालची, बड़बोले और अविश्वसनीय राष्ट्रध्यक्ष का कोई दूसरा उदाहरण नहीं। ट्रंप के इसी तीन मुख्य चरित्र ने दुनिया को विश्वयुद्ध तथा अमेरिका को विश्व शक्ति के रूप में अपनी पद और प्रतिष्ठा बचाने की दहलीज पर ला दिया है।

    खनिज संपदा से भरे ग्रीनलैंड, यूक्रेन, बेंजुएला तथा बलूचिस्तान आदि पर कब्जा करने को लपलपाती उनकी जुबान देखकर अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी (यूरोपीय संघ और नाटो) भी उन्हें दुत्कार रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ तक का अस्तित्व डावांडोल है।

    पूरे अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन जारी – वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें –

    https://x.com/i/status/2038009102505259489

    अमेरिकी सुरक्षा छतरी के नीचे खुद को सुरक्षित महसूस करने वाले अरब देश आज सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। अंत में एक बात और, खुद में तमाशा बन चुका यह उद्दंड व्यक्ति अपनी पराजय न पचा पाने के कारण, ईरान पर “परमाणु हमला” भी करवाकर विश्व को अवर्णनीय तबाही और सदमे में झोंक दे तो कोई आश्चर्य नहीं।

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