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    Home»राजस्थान

    लोकतंत्र में पारदर्शिता: नेताओं की जवाबदेही की मांग

    ShagunBy ShagunAugust 24, 2025Updated:August 24, 2025 राजस्थान No Comments5 Mins Read
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    राकेश कुमार मिश्र

    (लेखक विद्यांत हिंदू पीजी कालेज लखनऊ के पूर्व उप प्राचार्य हैं)

    हमारे देश में राजनैतिक दलों के अधिकांश नेता दुहाई तो इस बात की देते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है और वोट पाने की ख़ातिर जनमानस को भगवान का दर्जा देने की बात कहते हुए सुने जा सकते हैं विशेष तौर पर चुनाव के वक्त। वे अपने को सामान्य जनता का सेवक एवं एकमात्र हितैषी साबित करने के लिए बड़े से भी बड़ा त्याग करने की बात बार बार दुहराते हैं। हकीकत यह है कि अधिकांश नेता अपने को शहंशाह से कम नहीं समझते और अपने को हर कानून से ऊपर मानते हैं। सभी नेता अपने लिए एक विशेषाधिकार चाहते हैं और उनका तर्क रहता है कि जनता ही उनके सही या गलत होने पर मोहर लगा सकती है और सजा या ईनाम दे सकती है। राजनीति में पारदर्शिता लाने के लिए उठाए गए किसी भी कदम का ये नेता पुरजोर विरोध करते हैं तो इसी सोच के कारण कि वे सामान्य जनता से ऊपर हैं। राजनैतिक दलों और उनके नेताओं को आर टी आई के दायरे में लाने की बात हो या उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच एवं उस पर कार्यवाही करने की बात हो, आपको इनका एक ही सुर सुनाई देगा कि इससे सत्तापक्ष को विपक्षी नेताओं को फंसाने एवं उनका उत्पीड़न करने का अवसर मिलता है जो अन्यायपूर्ण एवं दमनकारी है ।

    राजनैतिक दलों में सत्तापक्ष एवं विपक्ष का खेल तो जीत या हार के आधार पर चलता ही रहता है। ऐसे में नेता आखिर चाहते क्या हैं कि उन पर नेता होने के कारण कभी कोई कानूनी कार्रवाई न की जा सके चाहे उन पर कितने ही गंभीर आरोप हों और जेल जाने पर भी उनके पद पर कोई आंच न आए। किसी भी राजनैतिक दल के नेता आखिरकार लोक सेवक ही हैं और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह होना ही होगा। सामान्य जनता भी यही चाहती है कि यदि उनके चुने गए प्रतिनिधि जनकल्याण का रास्ता भूलकर भ्रष्टाचार या किसी अन्य संगीन अपराध में लिप्त पाए जाते हैं तो उन पर सामान्य नागरिक की ही भांति कठोरतम कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

    आखिर इस बात का क्या औचित्य है कि एक सरकारी कर्मचारी यदि 48 घंटे से अधिक जेल में रहता है तो उसका स्वतः निलम्बन हो जाता है परन्तु नेताओं के लिए कोई ऐसा कानून नहीं है कि वो नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र न दें तो उन्हें पद से हटाया जा सके या उन्हें त्यागपत्र देने के लिए मजबूर किया जा सके। देश का उच्चतम न्यायालय भी केजरीवाल के जेल से सरकार चलाने एवं मुख्यमंत्री बने रहने पर ऐसे किसी भी कानूनी प्रावधान के अभाव में उन पर पद त्यागने के लिए किसी भी आदेश दिए जाने पर अपनी मजबूरी व्यक्त कर चुका है। जहाँ तक इस विषय पर कानून न होने की बात है, मेरा मानना है कि संविधान निर्माताओं ने उस समय यह सोचा भी नहीं होगा कि जनता द्वारा एक चुना हुआ कैंडिडेट इस हद तक लालची एवं सत्तालोलुप हो जाएगा कि वह सभी नैतिक मर्यादाओं को धता बताकर जेल जाने की भी स्थिति में भी अपने पद से चिपका रहेगा और राजनैतिक षड़यंत्र या साजिश के बहाने पद त्यागने से इनकार करेगा।

    अपने देश में ही जयललिता, येदुरप्पा, लालू प्रसाद यादव से लेकर हाल ही में हेमंत सोरेन तक अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब राजनेताओं ने जेल जाने से पूर्व अपना त्यागपत्र दिया और जमानत मिलने या दोषमुक्त होने पर पुनः मुख्यमंत्री या मंत्री पद संभाल। ऐसी स्थिति में कुछ नेताओं की हठधर्मिता एवं उनके अराजक रवैये के कारण देश में लोकतंत्र को अपमानित नहीं किया जा सकता। यह भी हास्यास्पद एवं महत्वपूर्ण है कि देश में राजनीति की दिशा बदलने की दुहाई देने वाली एवं आम आदमी की सरकार बनाने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ही इस अनैतिक आचरण को बढ़ावा देने में सबसे आगे रही। देश के लोकतंत्र को इस अराजक एवं अनैतिक परिस्थिति से भविष्य में बचाने के लिए ही ऐसे कानून लाने के लिए सरकार को कदम बढ़ाना पड़ा। ऐसे में विपक्षी दलों एवं उनके नेताओं द्वारा इस कानून का विरोध उनकी राजनीति में शुचिता एवं पारदर्शिता के प्रति झूठे आडंबर का ही एक उदाहरण है। विपक्षी दलों की यह आशंका निराधार नहीं है कि इस कानून का दुरूपयोग सत्ताधारी दल विपक्षी दलों की सरकारों को अस्थिर करने के लिए कर सकता है परन्तु इसका निदान एक नेक नियत से लाए गए लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कानून का विरोध नहीं हो सकता। विरोध के स्थान पर विपक्ष को इस बात पर रचनात्मक सुझावों के साथ आगे आना चाहिए कि कोई भी भविष्य में इस कानून का दुरूपयोग न कर सके।

    हमने अपने लोकतांत्रिक इतिहास में लंबा रास्ता तय किया है और कई बार ऐसे दौर देखे हैं, जिन्होंने लोकतंत्र के मूल्यों को ठेस पहुंचाई। चाहे वह आपातकाल का समय हो, जब लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं का दमन हुआ, या धारा 356 का दुरुपयोग कर निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त करना हो। फिर भी, हमारा लोकतंत्र दृढ़ता से खड़ा रहा। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 39वें संशोधन के जरिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को न्यायिक जांच से मुक्त करने का प्रयास हुआ, जब विपक्षी नेता जेल में थे। वर्तमान में सरकार ने एक ऐसा कानून प्रस्तावित किया है, जिसके तहत प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री यदि 30 दिन से अधिक जेल में रहते हैं, तो उन्हें पदमुक्त माना जाएगा। विपक्ष द्वारा इस समावेशी कानून का आशंकाओं के आधार पर विरोध करना तर्कसंगत नहीं लगता।

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