गत दिनों एक वर्कशॉप लेने उदयपुर पहुँचा। उदयपुर मुझे फ़िर से वैसा ही लगा जैसा पहली मर्तबा वहाँ पहुँचा था तो लगा| कई जगह तथाकथित विकास का ना पहुंचना सुखद हैं| अख़बार में मैंने पढ़ा की शहरो की तर्ज पर होगा गाँव का विकास। मुझे गाँव पसंद है। वर्कशॉप ‘उन्नति’ नाम की एक गैर लाभकारी संस्था के साथ जमीनी रूप से कार्य कर रही आंगनवाड़ी महिलाए, उनके कार्यकर्ता के साथ थी।
मुझे एक किताब की फोटोकॉपी करवानी थी। दरअसल उसमे गाँव से सम्बन्धित कुछ काम-काज को अच्छी तरह से ‘प्लान इंडिया’ ने एक किताब के रूप में लिख रखा था। मैं ‘पारस महल होटल’ जहाँ हम ठहरे थे के पीछे गया। कुछ दूर चलते ही मुझे एक घर के बाहर एक लड़का मिला जिसकी उम्र 16-18 साल होगी। मैंने उस से पूछा भाई फोटोकॉपी कहाँ होगी ? उसने कहाँ यहाँ से सीधे चले जाओं, जहाँ रोड़ ख़त्म होगी वहाँ देख एक दुकान है| मैंने पूछा दोस्त कितनी दूर होगी। सर पर हाथ रखते हुए उसने कहा एक- दो किलोमीटर भी नहीं है। मैं छोड़ दु क्या आपको। मैं उसे आश्चर्य से देख रहा था। उसने पास खड़ी अपनी पड़ोसन से पूछा छोड़ दूँ क्या ?
मुझे थोड़ा अजीब लगा। अनजाने शख्स वो इस तरह बतिया रहा था जैसे मुझे बहुत अच्छी तरह जानता हों। उसने कहाँ रुको में गाडी लेकर आता हूँ। वो अन्दर चला गया। मैंने वहाँ खड़ी आंटी से पूछा आयेगा क्या ये ? उन्होंने कहा आयेगा।
थोड़ी देर में वो अपनी एक्टिवा लेकर आया और कहा बैठो, हम चंद मिनिट में फ़ोटो कॉपी वाली दुकान पर पहुँच गए। मैंने उस से पूछा आपका नाम क्या है। उसने कहा सब मुझे चिनू चिनू बोलते है।
हम वर्कशॉप खत्म कर दिल्ली आ गए। मुझे भिन्न भिन्न शहरों के विभिन्न विभिन्न लोकल मार्केट काफी आकर्षक लगते है| मैं मुंबई में लोकल स्टेसन से लगे लोकल मार्केट, दिल्ली में लक्ष्मीनगर और करोल भाग में सजी कॉपी- किताबो की दुकाने, मीना बाज़ार, रविवारी मार्केट आदि निहारता रहता हूँ| मुझे वहाँ के दुकानदारो के बेचने की स्टायल, भाव तोल मजेदार लगता हैं| मैं गुडगाँव बस स्टेंड के पास लोकल माक्रेट में घुस गया। जलेबी खाई, चाय पी, कुछ दुकानों पर पार्कर की रिफिल मांगी, खैर मिल मगाई एक जगह से। धार्मिक किताबो वाली दुकान में झाँका, एक डायरी ली और फ़िर जींस खरीदने एक दुकान में घुसा।
सारा मोल भाव करने के बाद 600 रूपए में बात ख़त्म हुई| मैंने पर्स देखा तो उसमे चंद दस के नोट और एक 100 का नोट था| मैने उसे कहा कैशलेस इंडिया? उसने मुंडी नहीं में हिलाई| मैंने कहा पैसे निकाल कर आता हूँ| उसने कहाँ 100 रूपए जमा कर जाओ फ़िर जावो| मुझे समझ नहीं आया ये क्या चल रहा है| फिर अहसास हुआ कि उसे तो भरोसा ही नही है कि मैं वापिस आऊंगा या नहीं| मुझे एक पल के लिए चिनू की याद आई। मैं थोड़ी देर रुका और फ़िर मेरे कानों में आवाज पड़ी – रेलवे स्टेशन रेलवे स्टेशन। मैं ऑटो में बैठ गया।






