हम निकलल रहनी खेतवा घूमे,
भंवरा देख मनवा गईल हरियराय।
बसंती ओढले बिया पियरकी चुनरिया,
ओकर गोदिया गईल बा गदराय।
नीचवा से माई देतिया खाना-पानी,
ऊपरा से सूरज रोशनी खूब फैलाय।
बाद में ना जाने का करिहें देवता,
अबहीं त सबकर चेहरा खिलखिलाय।
सरसो क फूल पर जब भंवरा घूमे,
त लोगन मन खूब खिलखिलाय।
भइया हो, इहे काहा ला बसंत,
जहां सबकर मन खूशी से भरी जाय।
– उपेंद्र नाथ राय ‘घुमन्तु’







