अंतरराष्ट्रीय संबंधो का मसला बहुत पेचीदा होता है। कई बार परस्पर शत्रु देशों के साथ भी रिश्ते सुधारने की चुनौती रहती है। राष्ट्रीय हितों के लिए यह चुनौती भी स्वीकार करनी होती है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में मिसाल कायम की है। कुछ दिन पहले वह मध्यपूर्व के तीन देशों की यात्रा पर गए थे।

आतंकवाद के खिलाफ साझा रणनीति:
ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी की भारत यात्रा चाबहार के हिसाब से भी उपयोगी रही। भारत ने चाबहार पोर्ट के पहले हिस्से का परिचालन नियंत्रण अठारह महीने के लिए अपने नियंत्रण में लिया। दोनों देशों के बीच नौ समझौते हुए। इसमें तेल, गैस, बैंकिंग क्षेत्र के समझौते भी शामिल है। आतंकवाद के खिलाफ साझा रणनीति बनाने और युद्ध प्रभावित अफगानिस्तान में सामरिक हितों के अनुरूप कार्य करने पर भी सहमति बनी। जिससे अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता कायम हो सके। इसके अलावा दोहरे कराधान से बचाव, राजकोषीय चोरी पर रोकथाम, एक दशक पुरानी प्रत्यर्पण सन्धि की पुष्टि , राजनयिक पास्पोर्टधारकों को वीजा छूट, आदि पर समझौते हुए। हसन रूहानी ने पहले ही कहा था कि वह भारत के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को उत्सुक है। ईरान अपने विशाल तेल और गैस संसाधनों को भारत के साथ साझा भी करना चाहता है। रूहानी की यात्रा से इस योजना पर अमल की संभावना बढ़ी है। चाबहार बन्दरगाह ईरान, अफगानिस्तान ही नहीं मध्य एशिया और योरोप तक भारत के साथ व्यापार के रास्ते खोलेगा। जाहिर है कि हसन रूहानी की भारत यात्रा बहुत उपयोगी साबित हुई है। इससे दोनों देशों के रिश्ते मजबूत हुए है। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि इस द्विपक्षीय रिश्तों पर मध्यपूर्व के तनाव का कोई असर नहीं पड़ेगा।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







