भूखी मर गयी संतोषी की मौत पर यक़ीन करें या मूडीज की रेटिंग पर?

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आर्थिक तरक्की या आर्थिक बर्बादी!

राष्ट्रभक्तों, हम राष्ट्र की एजेन्सियों पर यक़ीन करें..या विदेशियों पर ! अपनी आंखों पर यकीन करें.. भूख से मरते बच्चों पर यकीन करें.. बंद होते कारोबार और छिनते रोजगार की फिक्र करें.. फांसी पर झूलते किसानों का दर्द महसूस करें या विदेशी पेड एजेंसियों पर भरोसा करें!
 मूडीज की रेटिंग पर भरोसा कर लें, या भात..भात कहते भूखी मर गयी संतोषी जैसे लाखों भूखे बच्चो की भूख का अहसास करें ! या आक्सीजन की बिना तड़पते बच्चों के फूल से जनाज़ों को याद करें।
या ये ग़ौर करें कि भूखी मरने वाली संतोषी के चावलों का पैसा कहां गया?
 तड़पकर मरने वाले बच्चों के आक्सीजन के गबन की रकम कहा गयी?
नोटबंदी की तकलीफों के बाद काला धन कहां गया?
मूडीज की जेब में तो नहीं!
 नही तो फिर दिखाई देने वाली आर्थिक बर्बादी को मूडीज की रेटिंग आर्थिक तरक्की क्यों बता रही है !
 
नवेद

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