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    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: राष्ट्रप्रेम में स्व को समर्पित करने वाला संगठन

    ShagunBy ShagunOctober 1, 2025Updated:October 1, 2025 ब्लॉग No Comments9 Mins Read
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    स्वयं सेवक संघ
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    swati singh: भाजपा की वरिष्ठ नेता उप्र सरकार में मंत्री रह चुकी हैं
    Swati Singh: भाजपा की वरिष्ठ नेता उप्र सरकार में मंत्री रह चुकी हैं

    ( संघ की स्थापना दिवस पर विशेष )

    स्वाती सिंह

    एक ऐसा सामाजिक, सांस्कृतिक विश्व का सबसे बड़ा संगठन जो सौ साल की आयु में भी निर्बाध गति से आगे बढ़ रहा है। इसका कारण है, यह जगह चरित्र निर्माण का है, यहां हर व्यक्ति स्वहित का परित्यागकर राष्ट्रहित की चिंता करता है। यहां किसी का अपना कुछ नहीं, सबकुछ राष्ट्र के लिए समर्पित है। यही कारण है कि यहां उच्च दायित्व पर होने के बाद भी किसी में भी अहम नहीं है, क्योंकि जहां “मैं” नहीं, वहां अहम नहीं हो सकता। यहां हर व्यक्ति में “हम” की भावना होती है। सब एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं। इसी कारण तो इस एक करोड़ से भी ज्यादा लोगों के समूह को परिवार कहा जाता है। हां, मैं बात कर रही हूं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की, जिसे हम संघ परिवार भी कहते हैं।

    विजयादशमी के दिन आरएसएस अपना सौ साल पूरा करने जा रहा है। इस सौ साल में वह बुजुर्ग नहीं, और तरूण हुआ है। उसका हर दिन विस्तार हो रहा है। कुछ तो खास है इसमें जो बिना खाता बही के निर्विवाद बढ़ता जा रहा है। हर दिन इसमें प्रगति देखने को मिल जाएगी। अपने दायित्वों का निर्वहन हर जगह संघ करता है, लेकिन मीडिया से दूर रहकर। इसको अपने को हाइलाइट होने का शौक नहीं, सिर्फ अपने कर्तव्यों को पूरा करने का जुनुन है। जो जंगल से लेकर किसी आपदा के समय दिख जाएगा।

    जहां तक मैं समझती हूं। चरित्र निर्माण ही स्वयं सेवक संघ की प्रथम सोच होती है। इसी कारण यहां कोई सदस्यता शुल्क नहीं है, जिसको भी राष्ट्र, अपनी संस्कृति से प्रेम है, जो भी संघ के विचारों से मतैक्य है, वह संघ परिवार का सदस्य है। इस भावना की ही देन है कि एक करोड़ से अधिक संख्या होने के बावजूद आज तक संघ परिवार में कोई विवाद देखने को नहीं मिल सकता। परमपूज्य सरसंघचालक का पद भी निर्वाचन प्रक्रिया से नहीं, मनोनयन प्रक्रिया से होती है और आज तक उसमें विवाद नहीं हुआ। इसका कारण है, कोई पद अधिकारी का नहीं है, यहां कर्तव्यबोध का पद है। यहां कार्य दायित्व दिया जाता है।

    प्रथम सरसंघचालक परमपूज्य डाक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार ने आजादी से पूर्व ही देख लिया कि कांग्रेस राष्ट्रहित को अनदेखा कर सिर्फ कुछ धर्म को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है। इससे हिन्दूधर्म की संस्कृति, सभ्यता विनष्ट होने का खतरा मंडरा सकता है। इसकी रक्षा करने की दृष्टि से नागपुर में 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हुई। प्रथम बैठक में परमपुज्य डाक्टर एलवी परांजपे, बाल शिवराम मुंजे व बीएस मुंजे आदि शामिल हुए और ये संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं। इसका उद्देश्य हिंदू हितों की रक्षा करना है।

    संघ परिवार का नाम भी प्रथम सरसंघचालक परमपुज्य डाक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार ने ही रखा था। इसमें राष्ट्रीय शब्द का उपयोग कर राष्ट्र के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता। स्वयं सेवक शब्द स्वयंसेवी भावना को दर्शाता है। संघ शब्द एकता का बोधक है। यही राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना कभी स्वयं सेवक में अहम भाव को पैदा नहीं करने देती।

    यहां सबसे छोटी इकाई- शाखा होती है। यहीं से स्वयं सेवक तैयार होते हैं। शाखा के प्रमुख रूप से तीन पदाधिकारी होते हैं। शाखा कार्यवाह शाखा का सबसे बड़ा पद होता है। शाखा संचालक स्थानीय शाखा का नेतृत्व करता है। वहीं मुख्य शिक्षक शाखा में दैनिक कार्यों को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है।

    इसी शाखा से वैचारिक रूप से परिपूर्ण होकर कुछ लोग पूर्णकालिक हो जाते हैं यानि अपना पूरा समय संघ के नाम समर्पित कर देते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग विचारों से ओतप्रोत रहते हुए भी घर गृहस्थी में लगे रहते हैं। जो घर गृहस्थी में लगकर भी समय देते हैं। उन्हें संघ अपनी विभिन्न वैचारिक संगठनों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष आदि दायित्व देकर सक्रिय बनाता है, लेकिन संघ में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष जैसा कोई पद नहीं होता।

    संघ के 45 प्रांत

    दूसरी ओर संघ में पूर्णकालिक स्वयं सेवक प्रचारक के तौर पर काम करते हैं। प्रचारक अपने गृह जनपद को छोड़कर दूर-दूर तक जहां पर नियुक्ति हो वहां जाते हैं। वहां संघ कार्यालय ही इनका ठौर होता है। संघ की दृष्टि से पूरे राष्ट्र को 45 प्रांतों में बांटा गया है। प्रांत से ऊपर क्षेत्र होता है, यह 11 क्षेत्र हैं। इसके ऊपर केंद्र होता है।

    संघ शिक्षण वर्ग

    समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा के समय-समय पर विभिन्न संघ शिक्षण वर्ग भी लगता है, जहां पर विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें दीपावली वर्ग तीन दिनों का होता है। यह तालुका या नगर स्तर पर आयोजित होता है। शीत शिविर या हेमंत शिविर भी तीन दिन तक जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है। यह हर वर्ष दिसंबर माह में आयोजित होता है। निवासी वर्ग शाम से सुबह तक होता है। यह हर महीने शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित होता है।

    संघ शिक्षा वर्ग

    इसमें कुल चार प्रकार के वर्ग होते हैं, यह सभी उच्च स्तरीय प्रशिक्षण हैं। इसमें प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष हैं। प्राथमिक वर्ग एक सप्ताह का होता है। प्रथम वर्ग और द्वितीय वर्ग 20-20 दिन के होते हैं, जबकि तृतीय वर्ग 25 दिनों का होता है। प्राथमिक वर्ग का आयोजन सामान्यतया जिला करता है। वहीं प्रथम संघ शिक्षा वर्ग या प्रथम वर्ष का आयोजन सामान्यत: प्रांत करता है। द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग अथवा द्वितीय वर्ष का आयोजन क्षेत्र करता है, तृतीय वर्ष या तृतीय संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन हर साल नागपुर में ही होता है।

    संघ के बदलाव के बारे में तीसरे सरसंघचालक ने कहा था, जीवित प्राणी में जरूर होता है बदलाव

    अन्य संस्थाओं की तरह संघ में भी बहुत बदलाव आया है। इससे संघ कभी परहेज भी नहीं करता। पहले खाकी हाफ पैंट होता था, अब व फुलपैंट हो गया है। इस तरह कई कार्य पद्धति में बदलाव आए हैं। अब एक मुस्लिम राष्ट्रीय मंच भी संघ का आनुषांगिक संगठन है, जिसमें राष्ट्रवादी मुस्लिम स्वयं सेवक हैं और दूसरों को राष्ट्र के प्रति प्रेम की शिक्षा देते हैं। संघ के तीसरे सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने अक्टूबर 1976 में विजयादशमी उत्सव पर नागपुर में कहा था, “कुछ लोगों द्वारा कहा जा रहा है कि संघ बदल रहा है और इसे आगे भी बदलना है। सभी जीवित प्राणी अपने स्वाभाविक रूप में बदलते हैं। यह उनके विकास का संकेत है। जो बदल नहीं रहा है, वह जीवित नहीं है, मृत है। पर इस बदलाव को अपनी जीवनधारा की शिराओं को काटकर नहीं अपनाया जा सकता है।

    प्रचार प्रमुख ने लिखा है, संघ का उद्देश्य है समाज को मजबूत करना

    राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख परमपुज्य सुनील आंबेकर अपनी किताब ‘आरएसएस: 21वीं सदी के लिए रोडमैप’ में लिखते हैं कि संघ समाज पर शासन करने वाली एक अलग शक्ति नहीं बनना चाहता और उसका मुख्य उद्देश्य समाज को मज़बूत करना है। ‘संघ समाज बनेगा’ एक नारा है, जो आरएसएस में बार-बार लगाया जाता है।

    सरसंघचालक ने कहा था, कार्य प्रणाली है संघ और कुछ नहीं

    मौजूदा सरसंघचालक परमपूज्य मोहन भागवत ने कहा है कि संघ एक “कार्य प्रणाली है और कुछ नहीं”. उनके मुताबिक़, आरएसएस “व्यक्ति निर्माण का काम करता है।”.शाखा संघ की आधारभूत संगठनात्मक इकाई है, जो उसे ज़मीनी स्तर पर एक बड़ी मौजूदगी देती है। शाखा वह जगह है, जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों को वैचारिक और शारीरिक रूप से प्रशिक्षित किया जाता है।

    80 संगठन हैं आरएसएस के समूह में, करते राष्ट्रहित का काम

    यह भी कहा जा सकता है कि आरएसएस कई संगठनों का समूह है। इसके तहत वर्तमान में 80 से अधिक आनुषांगिक या समविचारी संगठन हैं। यहां भी संघ की भांति ही विभिन्न स्तरों पर पूर्णकालिक स्वयं सेवक होते हैं और उनकी नियुक्ति प्रचारक के तौर पर होती है। इनमें विद्या भारती शिक्षा के क्षेत्र में काम काम करता है, जिसके तहत पूरे भारत में 21,000 से अधिक स्कूलों का संचालन हो रहा है। वहीं सेवा भारती वंचितों और गरीबों के लिए काम करने वाला संगठन है। भारतीय मजदूर संघ श्रमिकों के अधिकारों के लिए काम करता है। वहीं संस्कार भारती कलाकारों के लिए काम करने वाला संगठन है। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम: वनवासियों के कल्याण के लिए काम करने वाला संगठन है, जो उनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सेवाएं प्रदान करता है।

    ये भी प्रमुख संगठनों में शामिल

    इसके अलावा विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, स्वदेशी जागरण मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, हिन्दु युवा वाहिनी, भारतीय किसान संघ आदि भी इनके प्रमुख संगठन है। बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या आंदोलन के समय प्रमुख भूमिका निभायी थी।

    कई बार लगे प्रतिबंध, लेकिन निखरता रहा संघ

    संघ की स्थापना के बाद कई बार उसे अग्नि परीक्षा से भी गुजरना पड़ा। संघ के पदाधिकारी और स्वयं सेवकों को प्रताड़नाएं भी दी गयीं, लेकिन संघ कभी अपने विचारों से डिगा नहीं, टूटा नहीं, हमेशा अडिग रहा और प्रतिबंध रूपी आग में तपने के बाद और उसमें निखार ही आता चला गया। पहली बार संघ पर प्रतिबंध महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में लगा था। उस समय सरकार को आशंका थी कि गांधी जी का हत्यारा नाथू राम गोड्से स्वयं सेवक था।

    संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर को गिरफ़्तार कर लिया गया। यह प्रतिबंध एक साल तक लगा रहा। दूसरी बार आपात काल के समय इंदिरा गांधी ने 1975 में प्रतिबंध लगाया था, उस समय भी आरएसएस के प्रमुख लोगों को प्रताड़ना झेलनी पड़ी। स्वयं सेवक जेलों में ठूस दिये गये। यह प्रतिबंध साल 1977 में आपातकाल के ख़त्म होने के साथ ही हट गया। साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद आरएसएस पर तीसरी बार प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन जून 1993 में बाहरी आयोग ने इस प्रतिबंध को अनुचित माना और सरकार को उसे हटाना पड़ा।

    (लेखिका भाजपा की वरिष्ठ नेता उप्र सरकार में मंत्री रह चुकी हैं।)

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