मास्क पहन कर दम घुटता है। मन करता है, अभी उतार फेकूं। फिर ख्याल आता है कि कौम की बेहतरी के लिए पहनना है, पहने रहो। ऊपर से प्रधान सेवक का आदेश है, जान भी जहान भी।
मास्क से ढके चेहरे कभी-कभी मुझे ‘अर्थशास्त्र’ की तरह लगते हैं। इन पर बाजार की छाया पड़ती मालूम होती है। जितनी तरह के लोग, उतनी तरह के मास्क। कुछ सामान्य मास्क पहनते हैं। कुछ हॉट मास्क पहनते हैं। कुछ सेक्सी मास्क पहनते हैं। कुछ ट्रैंडी मास्क पहनते हैं। कहूं तो इन दिनों मास्क ही मनुष्य का चाल और चरित्र निर्धारित कर रहा है।
बाजार मास्कों से भरा पड़ा है। जहां जिधर निगाह डालता हूं उधर ही मास्क टंगे नजर आते हैं। मास्क के दामों में भी मोल-भाव हैं। इत्ते का नहीं, उत्ते का। दुकानदार भी मजबूर है। खरीदार भी मजबूर।
मास्क धीरे-धीरे कर ‘फैशन का हिस्सा’ बन रहा है। जिस कलर ही लंगोट है, उस कलर का मास्क। या जिस कलर का ब्लाउज है, उस कलर का मास्क। सड़क पर निकलता हूं तो पाता हूं, मास्क का ‘फैशन शो’ सा चल रहा है। जो मास्क नहीं पहना पाया जाता, उसे ‘हेय दृष्टि’ से देखा जा रहा है। आदमी कने खाने के पैसे न हों पर मास्क खरीदने के पैसे जरूर होंगे। क्या करे मजबूरी है। मजबूरी का नाम इन दिनों मास्क है।
मास्क पर चुटकुले हैं। मास्क पर हास्य है। मास्क पर व्यंग्य है। मास्क पर मीम हैं। मास्क पर चुलहें हैं। मास्क पहनना उस अनुभव से गुजरना है, जैसे ध्यान लगाकर केवल पोर्न के बारे में सोचना। कोरोना ने बहुत सारी आदतें डलवाई हैं तो कुछ छुड़वाई भी। जैसे- हनीमून पर सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखना। आदि।
गरीब और गरीबी की परिभाषा बदल गई है। जिसके कने मास्क नहीं वो गरीब। शुक्र है, मैं अभी गरीब नहीं हुआ हूं। मेरे कने मास्क है। लेकिन मैं गरीब होना चाहता हूं। सुना है, गरीबों पर कवि लोग कविताएं बहुत अच्छी लिखते हैं। बड़े-बड़े ऊंचे इनाम-इकराम पाते हैं। कविता संग्रह भी लाते हैं।
मैं जल्द ही अपने मास्क से मुक्त होने की फिराक में हूं। ताकि मुझे गरीब समझ कविगण मुझ पर कविताएं लिख सकें।
– अंशुमाली रस्तोगी







