पढ़ता कम हूं…

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अंशुमाली रस्तोगी

मेरे पास किताबों की विशाल लाइब्रेरी नहीं है। अधिक किताबें इकट्ठा इसलिए भी नहीं कीं, एक तो रखने की जगह नहीं, दूसरा पढ़ने का शौक भी सीमित ही है। मैं पढ़ाकू टाइप न अपने छात्र जीवन में कभी रहा न लेखक बनने के बाद। उतना ही पढ़ता हूं, जितने भर से काम चल जाए। सिर्फ पढ़ना ही नहीं, मैं लेखन भी सिर्फ काम चलाने भर का ही करता हूं। क्योंकि बड़ा या महान लेखक होने-बनने के अपने कष्ट हैं।

एक किताब को पढ़ना शुरू करने के बाद, उसे खत्म कब तक कर पाऊंगा, नहीं जानता। किताब को रस लेकर पढ़ने में जो आनंद है, वो जल्दी पढ़कर समाप्त करने में नहीं। आखिर आप किताब पढ़ रहे हैं, नाकि घास काट रहे हैं। कोई दो महीने से मैं दो किताबें साथ-साथ पढ़ रहा हूं; एक- ज्ञान चतुर्वेदी जी का दिलचस्प उपन्यास ‘स्वांग’ और दूसरा- मन्मथनाथ गुप्त जी की आत्मकथा ‘सिर पर कफन बांधकर’।

मैं अक्सर हैरान हो जाया करता हूं, जब कोई मुझसे कहता कि फलां किताब मैंने एक ही रात या दो दिन में पढ़कर खतम कर डाली! सच कहूं, मेरा सिर उस महान आत्मा के समक्ष वैसे ही झुक जाता है, जैसे पिछले सात सालों से मोदी भक्तों का सिर अपने देवता के आगे झुका हुआ है। पढ़ने की इतनी विकट गति, कमाल है। कमाल है।

लेकिन ऐसे पढ़ने का कोई मतलब इसलिए भी नहीं है, अगर पढ़कर आप खुद को बदल नहीं पा रहे। हजारों किताबें लाइब्रेरी में जमा कर लेने या कुछ ही घंटों में किताब पढ़कर खतम कर लेने भर से ही अगर आप महान होने की लिस्ट में शामिल होना चाहते हैं तो शौक से हो लीजिए पर बौद्धिक स्तर पर रहेंगे आप कुबड्ड के कुबड्ड ही। फिर निर्भर यह भी करता है कि आप पढ़ क्या रहे हैं? गांधी को पढ़कर गांधी भक्त बनने से बेहतर है कि आप उनकी आलोचना करने और सुनने की ताकत भी रखिए। यों भी, गांधीवाद में कुछ धरा नहीं। सब लफ्फाजी है।

बता दूं, अंगरेजी साहित्य मेरे पास न के बराबर है। अव्वल तो मेरी अंगरेजी ही इस लायक नहीं कि इसमें लिखा सबकुछ समझ-जान सकूं। भाषा से मुझे कोई परहेज नहीं। हर भाषा का अपना महत्त्व है। अंगरेजी का भी है, उर्दू का भी है, मराठी का भी है; अन्य का भी। पर मेरे कने हिंदी भाषा के ही इतने सारे लेखक पढ़ने को बाकी हैं, अंगरेजी वालों के लिए समय ही नहीं मिल पाता। हां, हिंदी में अनुवादित कुछ मिल जाए तो अवश्य पढ़ लूंगा। अंगरेजी को पढ़ने-समझने के लिए मुझे दिमाग पर अतिरिक्त जोर डालना पड़ता है, बस इसी से मैं कतराता हूं।

किंडल पर मैंने आज तक कभी कुछ नहीं पढ़ा। भविष्य में इस पर पढ़ने का इरादा भी नहीं रखता। किंडल पर पढ़ना प्रायः मुझे केंडिल में पढ़ने का सा अहसास कराता है। चूंकि मैं खुद को एलिट वर्ग का नहीं मानता इसलिए किताब को हाथ में थामकर पढ़ने का सुख लेता हूं। किंडल पर पढ़ने वाले मुझे ‘दूसरी दुनिया’ के लोग लगते हैं। चाहे तो मेरी पिछड़ी सोच पर आप मुझे गारिया भी सकते हैं। मैं कतई बुरा न मानूंगा।

कम पढ़ता हूं मगर आनंद के साथ पढ़ता हूं। काफी है मेरे बुद्धि-विवेक के लिए।

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