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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    बहराइच: घाघरा पार का टिकट: 20 रुपये, कीमत: जान

    ShagunBy ShagunNovember 21, 2025 Hot issue No Comments5 Mins Read
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    Bahraich: Ticket across Ghaghra: Rs 20, cost: life
    50 साल से पुल माँग रहे, हर साल लाशें गिन रहे – बहराइच की अनसुनी चीख
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    नाव पलटी, सपने डूबे: बहराइच की वो काली तारीख़ें जो भुला दी जाती हैं

    लेखक: रचित सक्सेना

    उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में घाघरा नदी का किनारा। हरे-भरे जंगल, वन्यजीवों की दुनिया, और बीच में फँसे गाँव जहां जिंदगी नाव की एक सवारी पर टिकी रहती है। लेकिन ये सवारी अक्सर मौत की ओर ले जाती है। 29 अक्टूबर 2025 को हुआ ताजा हादसा इसी की एक दर्दनाक मिसाल है , एक नाव पलटी, और जिंदगी की डोर टूट गई। ये कोई पहली बार नहीं हुआ, बल्कि सालों से चली आ रही त्रासदी है। आइए, इस जंगल की गहराई में झांकें, जहां लोग मौत से रोजाना आंख मिचौली खेलते हैं, और समझें कि क्यों ये इलाका “नदी की कैद” में जी रहा है।

    ताजा हादसा: कौड़ियाला नदी में डूबी जिंदगियां

    29 अक्टूबर 2025 को बहराइच के सुजौली थाना क्षेत्र में कौड़ियाला नदी (जो घाघरा में मिलती है) में एक नाव पलट गई। नाव में 22-28 लोग सवार थे जिसमें ज्यादातर मजदूर, महिलाएं और बच्चे, जो बाजार से लौट रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नाव ओवरलोड थी, और बीच धारा में असंतुलित होकर पलट गई।

    मौतों का आंकड़ा: शुरुआत में एक महिला की लाश मिली, लेकिन अब तक 5 मौतें कन्फर्म हो चुकी हैं, जिनमें 5 बच्चे शामिल हैं। 4-8 लोग अभी भी लापता हैं। 13 लोगों ने तैरकर अपनी जान बचाई, लेकिन कई घायल हैं।

    राहत कार्य भी ड्रामेटिक रहा। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें सर्च कर रही थीं, लेकिन जंगल में जंगली हाथियों ने हमला कर दिया, जिससे रेस्क्यू रोकना पड़ा। हाथियों ने चार्ज किया, और टीमों को पीछे हटना पड़ा – ये इस इलाके की एक और हकीकत है, जहां इंसान और वन्यजीव दोनों ही खतरे में हैं।

    5 नवंबर 2025 तक, हादसे का 8वां दिन था, लेकिन सर्च ऑपरेशन खाली हाथ रहा। स्थानीय लोग कहते हैं, “नदी ने सब कुछ निगल लिया।”

    bhedia bahraich
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    जंगल में फंसी जिंदगियां: एक अलग दुनिया

    बहराइच का ये जंगल इलाका – श्रावस्ती और बहराइच जिलों के बीच – करीब 80-100 गाँवों का घर है। ये गाँव घाघरा नदी के पार बसे हैं, जहां पहुंचने का एकमात्र रास्ता पुरानी लकड़ी की नावें हैं। कोई पुल नहीं, कोई सड़क नहीं। लोग रोजाना नदी पार करते हैं – बाजार जाने, स्कूल पहुंचने, या अस्पताल के लिए।

    https://shagunnewsindia.com/katarniaghat-triangle-of-death-8-missing-in-river-of-1200-crocodiles-after-boat-accident-wild-elephant-attacks-rescue-team/

    रोजमर्रा की जंग:

    • नाव का किराया 10-20 रुपये, लेकिन खतरा अनमोल। बच्चे स्कूल के लिए नाव लेते हैं, महिलाएं सब्जी बेचने जाती हैं। बारिश में नदी उफान पर होती है, तो गाँव महीनों तक दुनिया से कट जाते हैं।
    • वन्यजीवों का आतंक: जंगल में बाघ, तेंदुए, और हाथी घूमते हैं। हादसे के दौरान हाथियों का हमला कोई नई बात नहीं – ये जानवर अक्सर गांवों में घुस आते हैं, फसलें बर्बाद करते हैं।
    • जीवनशैली: ज्यादातर लोग मजदूरी या खेती पर निर्भर। बिजली स्पोराडिक, स्वास्थ्य सुविधाएं दूर। एक स्थानीय ने बताया, “हम जंगल में नहीं, मौत की घाटी में रहते हैं। नाव पलटना यहां की किस्मत है।”

    ये लोग थारू जनजाति के हैं, जो सदियों से यहां बसे हैं। उनकी संस्कृति प्रकृति से जुड़ी है, लेकिन आधुनिक विकास ने उन्हें छोड़ दिया। पुल की मांग 50 साल पुरानी है, लेकिन फाइलें घूमती रहती हैं।

    इतिहास की दर्दनाक कहानियां: दोहराती त्रासदियां

    ये कोई नई घटना नहीं। घाघरा नदी और बहराइच के जंगलों में नाव हादसे सालाना रूटीन हैं। कुछ प्रमुख:2022: कार्तिक पूर्णिमा मेले में नाव पलटी, 3 मौतें (2 बच्चे सहित)। 25 लोग सवार थे।

    • 2020: मऊ जिले में घाघरा में नाव डूबी, 5 मौतें।
    • 2010: बहादुरपुर इलाके में नाव हादसा, दर्जनों मौतें – “रिवर्स ऑफ डेथ” का नाम पड़ा।
    • 2024: श्रावस्ती में नाव पलटी, 1 मौत (बारिश से जुड़ा)।

    कारण एक जैसे: ओवरलोडिंग, अनट्रेंड नाविक, कोई लाइफ जैकेट नहीं, और सबसे बड़ा – पुल का अभाव। जंगली इलाका होने से रेस्क्यू मुश्किल। कुल मिलाकर, पिछले 10 सालों में 50+ मौतें सिर्फ नाव हादसों से।

    क्यों नहीं रुकते हादसे? और क्या हैं समाधान?

    • लापरवाही: नावें बिना लाइसेंस चलती हैं। प्रशासन मेले या बाजार के समय चेकिंग नहीं करता।
    • प्रकृति का खेल: घाघरा उफनती नदी है, बाढ़ में खतरनाक। जंगल में हाथी-बाघ का खतरा रेस्क्यू रोकता है।
    • मांगें: स्थानीय लोग पुल चाहते हैं। सीएम योगी ने हादसे पर संज्ञान लिया और मदद का वादा किया, लेकिन पुल कब बनेगा?

    एक दिलचस्प ट्विस्ट: ये हादसे सिर्फ दुख नहीं लाते, बल्कि सामाजिक बदलाव भी। कुछ गाँवों में अब लोग नावों पर लाइफ जैकेट की मांग कर रहे हैं, और एनजीओ जागरूकता फैला रहे हैं। लेकिन असल बदलाव पुल से आएगा।

    अंत में: उम्मीद की एक किरण?

    बहराइच का जंगल सुंदर है – पक्षियों की चहचहाहट, हरियाली, और थारू संस्कृति। लेकिन मौत की छाया इसे डरावना बनाती है। ये हादसे याद दिलाते हैं कि विकास की चमक शहरों तक सीमित क्यों है? शायद इस बार की 5 मौतें आखिरी हों, और पुल बने। अगर आप वहां के लोगों की मदद करना चाहें, तो लोकल एनजीओ से जुड़ें या आवाज उठाएं। जिंदगी नाव पर नहीं, मजबूत पुलों पर टिकनी चाहिए।

    Shagun

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