राहुल कुमार गुप्ता
1.
जहाँ जंग के मंज़र हों, वहाँ हम शौक पाले हैं।
सैकड़ों मौतों को भी हम तमाशा मानने वाले हैं।।
दहाड़ें मिसाइलों की और ख़ून के दरिया ज़मीं पर हों।
मगर हम दूर बैठ कर बस अदाकारी दिखाने वाले हैं।।
कहाँ तक गिर गई है आज इंसाँ की ये फ़ितरत भी।
दम तोड़ती इंसानियत पर हम जश्न मनाने वाले हैं।।
जो बुझते घर की आहें हैं, वो हमारे लिए ऩुस्खे हैं।
तबाही के मलबों में हम ख्वाब सजाने वाले हैं।।
कुछ कर नहीं सकते अगर तो दिल में रहम, लब पे
दुआ तो ला सकते हैं।
मगर हम न जाने कितने हिस्सों में बंटे और खुद को इंसा बताने वाले हैं।।

2.
कोई जिक्र ही करता है अब जंग की तो रूह काँप जाती है।
सुलगते मलबों और राख के ढेरों से चींखें खामोश आती हैं।।
कहीं इक बिलखती माँ है जो राख से ढका चेहरा चूमती है।
उस मासूम की मिट्टी,जाने कितने सवाल कर जाती है।।
कहीं कोई मासूम ले रहा सिसकियां, मां-बाप नींद से उठकर दुलारेंगे उसे।
कहीं किसी बेगुनाह के हिस्से में सिर्फ कयामत आती है।।
वो बहुत खुशनसीब हैं जो देख तो पाते हैं चेहरा अपनों का।
यहाँ तो आस लिए कई आँखें निशानियाँ भी कहां ढूंढ पाती हैं?







