जहाँ कभी गंगा-यमुना की सहेलियाँ बहती थीं, वहाँ अब जेसीबी की गड़गड़ाहट गूँज रही है
उत्तराखंड की नदियाँ आज एक खामोश, लेकिन बेहद खतरनाक संकट से गुजर रही हैं। जहाँ कभी निर्मल जलधारा शांतिपूर्वक बहती थी, वहाँ आज भारी मशीनों जैसे जेसीबी, पोकलैंड और डंपरों आदि का कब्ज़ा हो गया है। रेत और बजरी की अंधाधुंध, अवैध खुदाई ने नदियों को भीतर तक खोखला कर दिया है। कई जगहों पर नदी का प्राकृतिक प्रवाह पूरी तरह खत्म हो चुका है और नदी का तल गहरी खाइयों में तब्दील हो गया है।
पर्यावरणीय विनाश की चेतावनी: कटाव, भूस्खलन और खतरे में पुल
यह सिर्फ़ दृश्य बदलाव नहीं है। नदी किनारों पर तेजी से कटाव हो रहा है, जिससे आसपास के गाँव, खेत और पुलों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। भू-स्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। पूरा पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ चुका है। फिर भी कार्रवाई न के बराबर है।

खुलेआम अवैध खनन: कानून सिर्फ़ कागज़ों पर, मिलीभगत की आशंका
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब खुलेआम हो रहा है। नियम-कानून कागज़ों तक सीमित हैं। जमीनी हकीकत में खनन बिना किसी रोक-टोक के जारी है। अब यह केवल कुछ लोगों की अवैध गतिविधि नहीं रह गया बल्कि यह एक संगठित तंत्र बन चुका है, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है।
ये नदियाँ सिर्फ़ पानी नहीं, देवभूमि की संस्कृति और आस्था का आधार हैं
पहाड़ों की नदियाँ केवल पानी का स्रोत नहीं हैं। वे यहाँ की संस्कृति, आस्था, परंपरा और जीवन का आधार हैं। गंगा, यमुना, अलकनंदा, मंदाकिनी आदि ये सब देवी स्वरूप हैं। इन्हें इस तरह नष्ट होते देखना सिर्फ़ पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत पर हमला है।
अंत में अब सवाल यह है कि हम चुप रहेंगे या आवाज़ उठाएँगे?
अगर आज नहीं चेते, तो कल नदियाँ सिर्फ़ नाम रह जाएँगी। देवभूमि की इन जीवनदायिनी नदियों को बचाना अब हर उत्तराखंडवासी, हर पर्यावरण प्रेमी और हर जिम्मेदार नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। समय कम है।
देखिये अब आवाज़ उठाना ज़रूरी है इससे पहले कि नदियाँ हमेशा के लिए खामोश हो जाएँ।







