आज की भारतीय सामाजिक व्यवस्था का पुनरावलोकन बेहद जरूरी
राहुल कुमार गुप्ता
इस तकनीकी और नूतन दौर में सुबह का अखबार खोलने पर ऐसा महसूस होता है कि अब स्याही से खून टपक रहा हो, और सोशल मीडिया का हर नया स्क्रॉल छाती पर एक भारी पत्थर की तरह बैठ जाता है।
हम जिस भारत में सांस ले रहे हैं, वह धीरे-धीरे एक आलीशान लेकिन अंदर से खोखले पागलखाने में तब्दील होता जा रहा है। जिधर देखिए, इंसानी शक्ल में घूमते बारूद के ढेर नजर आते हैं, जो बस एक छोटी सी चिंगारी के इंतजार में हैं। रास्ते पर किसी की गाड़ी से आपकी गाड़ी छू जाए, तो माफी मांगने के बजाय लोग डिक्री से लोहे की रॉड निकाल लेते हैं। कहीं मामूली सी बात पर सात लड़के मिलकर एक नौजवान की जिंदगी की डोर बेरहमी से काट देते हैं, तो कहीं कोई हैवान अपने ही डेढ़ साल के सगे भतीजे को सड़क पर पटक-पटक कर मार डालता है। तो आए दिन मासूमों के साथ बलात्कार और हत्या जैसी घटनाएं रूह तक कंपा देती हैं। मर्यादा और मोक्ष की उम्मीद में जब लोग तीर्थ स्थलों की ओर रुख करते हैं, तो वहां भी कतारों में खड़े श्रद्धालु और स्थानीय लोग भगवान को भूलकर एक-दूसरे पर लाठियां भांज रहे होते हैं।
इस समाज में संवाद जैसे पूरी तरह आईसीयू में चला गया है। जो पुलिस रक्षक थी, वह सत्ता और वर्दी के नशे में चूर होकर अपने अधिकारों अतिक्रमण करते हुए उसी जनता पर अत्याचार के लिए उतारू हो जाती है जिसके टैक्स से इनका और इन जैसों का परिवार पलता पोसता है। हद तो तब हो जाती है जब न्याय के ऊंचे आसनों पर बैठे लोग देश के बेरोजगार और हताश युवाओं को ‘कॉकरोच’ समझने लगते हैं और मंचों से स्वघोषित युग कवि दहाड़ते हैं कि इन कॉकरोचों को चप्पल से मार देना चाहिए। इस नफरत की आग से कोई कोना अछूता नहीं है।
हर नुक्कड़, हर खंभे पर तीसरी आंख यानी सीसीटीवी कैमरे टंगे हैं, लेकिन वे कैमरे भी उस वहशीपन को नहीं डरा पाते जो किसी अकेली लड़की को देखकर उस पर झपट पड़ता है। घरों के भीतर का सन्नाटा और भी डरावना है। दहेज की सूली चढ़ती बेटियां हों या मामूली मनमुटाव पर पंखे से झूलते नौजवान, ये आत्महत्याएं अब समाज का एक आम हिस्सा बन चुकी हैं। आज देश का शायद ही कोई ऐसा मोहल्ला बचा हो जहां किसी न किसी घर में बेटा या बेटी अदालतों के चक्कर न काट रहे हों और उनके तलाक का मुकदमा न चल रहा हो।
पुराने बुजुर्ग कहा करते थे कि जिस देश में सफेद कोट वाले डॉक्टर और काले कोट वाले वकीलों की तादाद जरूरत से ज्यादा बढ़ने लगे, समझ लेना कि वह मुल्क शारीरिक और मानसिक रूप से अपाहिज हो चुका है।
आज आप भारत के किसी भी शहर के किसी भी चौराहे पर खड़े होकर नजर दौड़ाइए, अस्पतालों की गगनचुंबी इमारतें किसी मॉल की तरह चमक रही हैं और वहां पैर रखने की जगह नहीं है। कचहरियों के बाहर चले जाइए, काले कोट वालों की ऐसी बाढ़ दिखेगी मानो पूरा देश सिर्फ मुकदमों के सहारे जी रहा है। सबसे त्रासद बात यह है कि हम खुद अपनी बीमारियों, अपने गुस्से और अपने अहंकारी मुकदमों से इन दोनों जमातों की तिजोरियां भर रहे हैं। हम इस बात को स्वीकार करने से कतरा रहे हैं कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य पूरी तरह वेंटिलेटर पर है।
इस जलती हुई चिता पर देश की सियासत अपने वोट सेंक रही है और मुख्यधारा का मीडिया हर शाम टीवी स्क्रीन को कुरुक्षेत्र बनाकर समाज की बची-खुची चेतना में तेजाब उड़ेल रहा है। विचार न मिलना अब वैचारिक मतभेद नहीं, बल्कि सीधे-सीधे दुश्मनी और देशद्रोह मान लिया जाता है। डर का यह आलम है कि बच्चा अगर स्कूल से घर लौटने में सिर्फ पंद्रह मिनट की देरी कर दे, तो मां-बाप के हलक में प्राण अटक जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए; इस भयावह, अनिश्चित और दमघोंटू माहौल के बावजूद लोग बिना सोचे-समझे इस दुनिया में नई जिंदगियां, नए बच्चे पैदा किए जा रहे हैं। वे माता-पिता जो खुद गहरे डिप्रेशन और कुंठा में जी रहे हैं, वे नहीं जानते कि वे अपने बच्चों को विरासत में कैसा समाज सौंप रहे हैं।
इस सामूहिक पागलपन और अवसाद के मूल कारणों को टटोलें, तो इसकी सबसे पहली गाज हमारे सामाजिक ताने-बाने पर गिरी है। हमने आधुनिक बनने की अंधी होड़ में अपने उन संयुक्त परिवारों को मलबे में तब्दील कर दिया, जो किसी भी मानसिक तनाव के लिए थैरेपिस्ट का काम करते थे। पहले जब इंसान बाहर की दुनिया से जख्मी या गुस्से में लौटता था, तो घर के बुजुर्गों की डांट, बच्चों की किलकारी और भाइयों का साथ उसके गुस्से के जहर को पी जाता था। आज एकल परिवारों के इस दौर में इंसान अपने कंक्रीट के फ्लैट में अकेला रह गया है। उसके पास अपनी कुंठा साझा करने के लिए कोई जिंदा इंसान नहीं है, सिर्फ एक बेजान मोबाइल स्क्रीन है, जो नफरत को और हवा देती है। हमारे भीतर से उन संस्कारों का पूरी तरह वाष्पीकरण हो चुका है जो कभी हमें ठहरना और सहना सिखाते थे।
आज की संस्कृति इंस्टेंट यानी तुरंत सब कुछ पा लेने की भूख से ग्रस्त है। जीवन का एकमात्र मकसद ‘अर्थ’ यानी पैसा और अंधा स्वार्थ बन चुका है, जहां त्याग, दया और परोपकार जैसी बातें बेवकूफी मानी जाती हैं। हमने धर्म के वास्तविक मर्म (धैर्य, क्षमा, दया, करुणा, प्रेम और अंतर्मुखता) को पूरी तरह विस्मृत कर दिया है। आज हमारा धर्म सिर्फ लाउडस्पीकरों के शोर, झंडों की राजनीति और सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन तक सिमट गया है। जब कोई कौम अपनी जड़ों और पवित्र परंपराओं से इस कदर किनारा कर लेती है, तो उसका मानसिक संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है।
इस जानलेवा बीमारी से निजात पाने के लिए हमें किश्तों में नहीं, बल्कि मुकम्मल तौर पर खुद को बदलना होगा। मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हमें सबसे पहले यह मानना होगा कि मन की बीमारी कोई शर्म की बात नहीं है। स्कूलों के पाठ्यक्रम में गणित और विज्ञान के साथ-साथ इमोशनल इंटेलिजेंस (भावनात्मक समझ) और ध्यान को अनिवार्य करना होगा। विज्ञान कहता है कि प्रकृति से कटकर और स्क्रीन के अत्यधिक इस्तेमाल से हमारे दिमाग के हैप्पी हार्मोन्स खत्म हो रहे हैं, जिससे इंसान हिंसक पशु बन रहा है। इसलिए हमें अपनी भावी पीढ़ी को गैजेट्स से निकालकर मिट्टी और मैदानों से जोड़ना होगा। आध्यात्मिक स्तर पर हमें कर्मकांडों के पाखंड से बाहर निकलकर आत्म-अवलोकन की आदत डालनी होगी।
सामाजिक रूप से हमें अपने पड़ोसियों के साथ दोबारा संवाद का पुल बनाना होगा। राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी। पुलिस को लाठी की हनक छोड़कर जनता का हमदर्द बनना होगा और न्यायपालिका को यह सोचना होगा कि देश का गरीब और बेसहारा युवा उनका दुश्मन नहीं, बल्कि इसी व्यवस्था का सताया हुआ हिस्सा है। नेताओं और मीडिया को यह आत्मग्लानि होनी चाहिए कि समाज में जो नफरत वे बो रहे हैं, उसकी आंच से एक दिन उनके अपने घर भी सुरक्षित नहीं रहेंगे।
यह आलेख केवल एक विलाप नहीं है, बल्कि आपके और मेरे भीतर बची हुई आखिरी इंसानी सांस को जगाने की एक कोशिश है। इस अवसादग्रस्त देश को कोई मसीहा आकर नहीं सुधारेगा, इसकी शुरुआत हमें अपने घर, अपनी गली और अपने व्यवहार से करनी होगी। जब अगली बार कोई आपके रास्ते में आ जाए, तो हॉर्न बजाकर गाली देने के बजाय बस थोड़ा सा मुस्कुराकर उसे रास्ता दे दीजिएगा। जब कोई आपसे असहमत हो, तो उसे दुश्मन समझने के बजाय उसकी बात को शांत मन से सुनिएगा। इस देश को अब और बड़े अस्पतालों या और बड़ी कचहरियों की जरूरत नहीं है, इसे जरूरत है संवेदनशील दिलों और शांत मस्तिष्कों की। ठंडे दिमाग से बैठकर जरूर सोचिएगा, क्योंकि अगर आज भी हमने इस सामूहिक अवसाद को नहीं रोका, तो आने वाला कल हमें सोचने लायक भी नहीं छोड़ेगा। बदलाव की शुरुआत किसी और से नहीं, खुद से कीजिए।







