राजा का आईना कोई साधारण आईना होता नहीं।
उसमें खास कृत्रिम बुद्धिमत्ता और धूर्तता होती है भरी।।
वो भांप लेता है राजा को क्या पसंद है और क्या नहीं।
इसीलिए राजा कभी देख पाता नहीं अपना अक्स सही।।
वो सदा आत्ममुग्ध रहता है खुद और खुद के कामों से।
उसे फ़र्क नहीं पड़ता कि उसके राज्य में क्या बीत रही।।
पर सच की आँच से वो कृत्रिम परत भी एक दिन पिघलती है।
जनता की आह के आगे फिर कोई धूर्तता चलती नहीं।।
जब टूटता है वो भरम, तब समझ में आता है राजा को।
कि तख्त ओ ताज की ये चमक सदा यूँ ही रहती नहीं।।
- राहुल कुमार गुप्ता







