महाराष्ट्र में संकट ख़त्म हो गया है। आखिरकार भारतीय जनता पार्टी दुविधा से निकलने में कामयाब हो गई और पार्टी के वरिष्ठ तथा अनुभवी नेता देवेंद्र फडणवीस महायुति की सरकार के मुख्यमंत्री बन गए । दुविधा इसलिए स्वाभाविक थी क्योंकि पार्टी ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था। ऐसे में सहयोगी दलों के साथ संतोषजनक तालमेल बैठाना अक्सर लंबा खिंचता है क्योंकि उनके नेताओं की भी महत्वाकांक्षाएं होती हैं। यही स्थिति महाराष्ट्र में भी थी। वहां भाजपा ने निवर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा जिसमें सबसे ज्यादा सीटें उसी को मिलीं। यह सही है कि स्पष्ट बहुमत से उसमें 13 सीटें कम थीं। ऐसे में मुख्यमंत्री पद पर उसी का दावा बनता था लेकिन शिंदे इसे मानने को तैयार नहीं थे।

भाजपा ने धीरज से काम लिया क्योंकि पिछली शिंदे सरकार शिव सेना और एनसीपी में बड़ी टूट के बाद बनी थी और भाजपा ने डिप्टी सीएम का पद मजबूरी में संभाला था। मुंबई में कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी और उद्धव शिवसेना के दिग्गज और माहिर राजनीतिज्ञों की मौजूदगी को देखते हुए भगवा कैंप सहयोगी दलों को नाराज भी नहीं करना चाहता था।
शिंदे को साधना भाजपा के लिए इसलिए भी जरूरी था कि केंद्र की उसकी सरकार के टिके रहने के लिए शिंदे गुट के सात सांसदों का समर्थन बहुत जरूरी है। इसलिए सरकार के लिए शिंदे के विधायकों की कोई खास जरूरत न होते हुए भी वह उन्हें नाराज नहीं करना चाहती थी और शिंदे ने भी राजी होने के लिए आठ-नौ दिन लगा दिए। एक बात यह भी है कि राजनीति में केवल सरकार बना लेना ही अहम नहीं होता बल्कि इसके जरिए जनाधार में विस्तार भी मायने रखता है। भाजपा की रणनीति जातियों को भी साधने की है। इसलिए उसकी रणनीति अधिकाधिक वर्गों को साथ जोड़ने की है। फिलहाल महायुति सरकार के स्थायित्व को लेकर अब कोई संकट दिखाई नहीं देता।







