एक परिचित-अपरिचित नाम कलाकार जी

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  • सुमन सिंह
बिहार के पूर्णिया शहर में रहने वाले कलाकार जिन्हें वहाँ के लोग “कलाकार जी “ के नाम से ही जानते हैं, ने किस तरह से एक छोटे से गाँव से लेकर राष्ट्रपति पुरस्कार तक का सफर तय किया यह एक रोचक विषय है।
मुंगेर जिले के हवेली खड़गपुर को यूं तो कलाकार तथा कला के क्षेत्र के जानकार “मास्टर मोशाय ” यानि श्री नन्दलाल बोस की जन्मस्थली के नाम से परीचित हैं परंतु इसी क्षेत्र के एक और “मास्टर मोशाय ” यानि हम सबके कलाकार जी से शायद बहुत से लोग परीचित न भी हों। भले ही इस शिक्षक के छात्र कोई बिनोद बिहारी मुखर्जी, राम किंकर बैज या के.जी. सुब्रमन्यन नहीं बन पाए हों परंतु एक शिक्षक के रूप में अपने छात्रों को कला प्रशिक्षण के साथ-साथ एक अच्छे चरित्र तथा उनके व्यक्तित्व सँवारने एवं उन्हें एक सही राह दिखा कर उनमें एक अच्छी जीवन जीने की प्रेरणा जगाने में इस अनाम कलाकार का महत्वपूर्ण योगदान है। यहाँ इनकी तुलना मास्टर मोशाय से करने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार नंदलाल बोस ने कभी भी अपने करियर की न सोचकर हमेशा छात्रों की उन्नति की सोच में लगे रहे ठीक वैसे ही कलाकार जी ने भी छात्रों की ही सोची।
हवेली खड़गपुर से लगभग दो कि.मी. की दूरी पर दूर–दूर तक फैले हरे-भरे पहाड़ तथा सर्पाकार आकृति में बहती हुई नदी से थोड़ी ही दूर पर बसा है खैरा गाँव। इसी गाँव में 1939 में जन्मे श्री नरेंद्र प्रसाद सिन्हा की बुनियादी शिक्षा गाँव में ही हुई तथा हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए वे खड़गपुर गए। छात्र जीवन से ही इन्हें चित्र बनाने का शौक था खास कर रेखाचित्र में उनकी विशेष रुचि थी। भूगोल विषय की कक्षा में जब इन्हें कुछ रेखाचित्र बनाने होते थे तो अपना रेखाचित्र का काम पूरा कर अन्य सभी सहपाठियों के लिए भी रेखाचित्र बना दिया करते थे।
आगे चलकर यही रुचि उन्हें कला महाविद्यालय तक ले गई। यह उनकी व्यक्तिगत रुचि थी और कला के प्रति इनका रुझान बिल्कुल ही प्राकृतिक था। लेकिन गाँव से कला महाविद्यालय तक का सफर आसान भी नहीं था। हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात इनकी इच्छा थी कि कला की पढ़ाई करें। पटना में किसी ट्रेनिंग के लिए गए इनके एक मित्र ने इन्हें पटना आर्ट कालेज के बारे में जानकारी दी। फिर क्या था, इन्होंने मन तो बना लिया लेकिन जैसा कि अक्सर हर कलाकार के साथ होता रहा है वैसा ही इनके साथ भी हुआ।
घर के लोग इसके लिए तैयार नहीं थे।पटना में रह कर पढ़ाई का खर्च उठाना भी आसान नहीं था। इनके बड़े भाई साहब ने इन्हें पास के एक हेडमास्टर के पास ले गए और उनसे पूछा कि कला की पढ़ाई करने के बाद का भविष्य क्या है? उनके नकारात्मक टिप्पणी से दुखी ये घर वापस आकर क्षुब्ध होकर बैठ गए। इतने में चचेरे भाई जो खुद एक शिक्षक थे ने जब यह स्थिति देखी तो उन्होंने मामला सुलझा दिया तथा कला महाविद्यालय में दाखिले के लिए जाने की अनुमति दिलवाई और नरेंद्र पटना के लिए रवाना हो गए।
पटना आर्ट कालेज की प्रवेश परीक्षा में बनाए गए इनके चित्र को देख कर शिक्षक चकित रह गए और इन्हें सीधे द्वितीय वर्ष में दाखिला दे दिया गया। हॉस्टल में रहकर कठिन परिश्रम करते हुए 1960 में अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात इन्होंने जीविकोपार्जन के लिए अन्य तरह की संभावनाओं को छोड़ शिक्षण को अपनाया। शुरुआत से ही इन्हें शिक्षक बनना पसंद था।
इनकी नियुक्ति 1961 में पूर्णिया के जिला स्कूल में कला शिक्षक के पद पर हुई और यहाँ रहते-रहते यहीं के हो कर रह गए । पूर्णिया में हर कोई इन्हें कलाकार जी के नाम से ही जानता है। जिला स्कूल में नियुक्ति के कुछ वर्षों के पश्चात इनकी मुलाकात पूर्णिया के ही अद्भुत प्रतिभा के धनी पर गुमनाम चित्रकार श्री विश्वनाथ सिंह से हुई जिन्होंने इन्हें पूर्णिया में अवस्थित कला भवन आने का न्योता दिया।
कला भवन, पूर्णिया में लगी विश्वनाथ जी के चित्रों की प्रदर्शनी के दौरान ही नरेंद्र जी की मुलाकात बिहार विधान सभा के अध्यक्ष तथा कला भवन, पूर्णिया के संस्थापक श्री लक्ष्मी नारायण “सुधांशु” तथा राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह “दिनकर” से हुई। बातचीत के दौरान कलाभवन में बच्चों से कला संबंधी गतिविधियां करवाने पर चर्चा हुई और तभी से कला भवन, पूर्णिया में चित्रकला प्रशिक्षण की शुरुआत हुई। शुरुआत में तो यह कभी-कभार होने वाला आयोजन था लेकिन कलाकार जी ने नियमित तौर पर प्रत्येक रविवार को चित्रकला प्रशिक्षण का जिम्मा अपने हाथ में ले लिया। धीरे-धीरे और लोग भी जुड़ने लगे। इसी क्रम में शांतिनिकेतन से कला की शिक्षा प्राप्त किए श्री योगेंद्र मिश्र भी शामिल हो गए। इन लोगों ने मिलकर इस प्रशिक्षण केंद्र को कला महाविद्यालय में तब्दील करने की सोची और इसके लिए काफी कुछ प्रयास भी किया। सब कुछ अच्छा चल रहा था।
इस दरम्यान इन पंक्तियों का लेखक भी इस प्रशिक्षण केंद्र का छात्र रहा था। लेकिन सुधांशु जी के निधन के पश्चात कलाभवन की स्थिति बिगड़ती गई। नए-नए प्रबंधकों का आना-जाना लगा रहा और स्थिति में सुधार का कोई लक्षण नहीं देख कर ये शिक्षक भी हतोत्साहित होकर उम्मीद छोड़ दिए और इस तरह इन लोगों का कला महाविद्यालय बनाने का सपना अधूरा ही रह गया। इधर जिला स्कूल जहाँ कलाकार जी शिक्षारत थे वहाँ भी सरकार की उपेक्षा की वजह से कला संबंधी गतिविधियाँ कम होती गयी और कई वर्षों तक स्कूली बच्चों के साथ समय बिताने के बाद इन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान की नौकरी लेकर पूर्णिया से सहरसा चले गए। फलतः कला भवन, पूर्णिया के चित्रकला प्रशिक्षण विद्यालय का समापन हो गया।
कई वर्षों तक सहरसा के बी.एड. कालेज में शिक्षण का कार्य करते हुए अवकाश प्राप्त कर 1997 में वापस अपने निवास पूर्णिया आ गए। अब वे यहीं रहते हैं तथा अपने निवास में ही प्रत्येक रविवार छात्रों को चित्रकला प्रशिक्षण का कार्य कर रहे हैं।
कलाकार जी की एक खूबी यह भी है कि ये जो भी करते हैं उसमें डूब जाते हैं। जिला स्कूल में शिक्षण के दौरान इन्हें स्काउटिंग से परिचय हुआ। उत्सुकतावश इन्होंने इसका प्रशिक्षण लिया और इसमें भी रम गए। चूंकि छात्रों के साथ समय बिताना इन्हें अच्छा लगता था। अब यह अच्छा अवसर था छात्रों से घुलने मिलने का। एक बार जो इन्होंने स्काउटिंग को पकड़ा तो सहरसा जाने पर भी नहीं छोड़ा। बी.एड. कालेज में रहने के दौरान भी इसमें भरपूर योगदान देते रहे। ये एक ही ऐसे व्यक्ति थे जिनमें स्काउटिंग के साथ-साथ कला की जानकारी भी थी। इसकी वजह से स्काउट कैंप में किसी भी तरह की कलात्मक गतिविधियों के लिए ये जाने जाते थे।
राष्ट्रीय स्तर के स्काउट जमावरे जिसे जंबूरी कहते हैं में इन्होंने कई बार अपने तथा छात्रों के चित्रों की प्रदर्शिनी लगाई तथा झांकियों का निर्माण भी किया। इन पंक्तियों का लेखक भी ऐसे एक कलात्मक कार्य में एक बार उनका सहयोग देने उनके साथ दिल्ली गया था, जहाँ इन्होंने प्रसिद्ध कलाकार श्री देवीप्रसाद रायचौधरी की मूर्तिकला “शहीद स्मारक “ की अनुकृति सात छात्रों को रुपहले रंग में रंगकर उसी मुद्रा में खड़ा कर सबों को चौंका दिया था। वहाँ की मुख्य अतिथि थीं तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी।
दूसरे दिन दिल्ली के अखबारों में इसकी काफी चर्चा हुई थी। हाँ! यह बात अलग है कि यह युवा कांग्रेस का अधिवेशन था और कलाकार जी को झांकी बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसी तरह मद्रास की स्काउटिंग जंबूरी में इन्होंने बिहार की ओर से झांकी प्रस्तुत की। इस झांकी में बुद्ध के जीवन की प्रस्तुति विभिन्न प्रकार के चित्र तथा मूर्ति के द्वारा की गई जिसकी काफी सराहना हुई। इस तरह से स्काउटिंग तथा कला को जोड़ने का इनका यह अनूठा प्रयास था जिससे कलाकार जी की ख्याति पूरे देश में हुई और इसके लिए इन्हें स्काउटिंग का राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम के हाथों इन्हें यह पुरस्कार प्राप्त हुआ।
कलाकार जी कला की हर विधा में अपना दखल रखते हैं। मूर्तिकला में भी इनकी रुचि कम नहीं है। इन्होंने तैलचित्र तथा जलचित्र दोनों माध्यम में काम किया है। लेकिन कम खर्च तथा शीघ्र पूर्ण कर पाने के कारण इनके ज्यादातर चित्र जलरंगों में हैं जिसमें मुख्यतः भूचित्र हैं।
इनके आकृतिमूलक चित्रों में उस दौर के कलाकारों की तरह की ही भावनात्मक विषय तथा शैली दिखती है। इनके चित्रों के विषय मुख्य तौर पर सामाजिक परिवेश जैसे शादी-व्याह, पर्व-त्योहार आदि हैं। मध्यम आकार के इन चित्रों में परिवेश की झलक साफ देखी जा सकती है। इनके चित्रों को देखने पर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इस कलाकार की सरल व्यक्तित्व को आसानी से पढ़ सकता है। भले ही इनके चित्रों में आधुनिक या समकालीन कला की झलक किसी को न दिखे परंतु जिस दौर के ये कलाकार रहे हैं उस दौर की कला की छाप तो अवश्य ही इन चित्रों में देखने को मिलती है। हमें उस दौर की शिक्षा पद्धति, जानकारी तथा जागरूकता को अवश्य ही ध्यान में रखने की आवश्यकता है। भावनात्मक विषयों पर चित्र बनाने वाले कलाकार जी ने कभी भी अपने चित्रों की प्रदर्शनी नहीं की। जब भी प्रदर्शनी आयोजित की गयी छात्रों के चित्रों के साथ ही इन्होंने अपने चित्र प्रदर्शित किये। इनका मानना है कि इससे छात्रों में उत्साह बढ़ता है तथा छात्रों को सीखने का मौका भी मिलता है।
कलाकार जी केवल चित्रकार या स्काउट प्रशिक्षक ही नहीं हैं। वे एक समाजसेवी भी हैं। इन्होंने बहुत तरह से समाज की सेवा की है परंतु कभी भी इसकी चर्चा करना पसंद नहीं करते हैं। जिसमे से एक की चर्चा करना आवश्यक है। अपने इस समाज सेवी प्रवृति के कारण इन्होंने दो भाइयों को एक नया जीवन दिया जो पता नहीं आज कब, कहाँ और किस हाल में होते ।
दरअसल ये दोनों भाई एक तरह से अनाथ ही हो गए थे तथा अपने ही एक रिश्तेदार के घर नौकरों की तरह जीवन बसर कर रहे थे। जब कलाकार जी को पता चला कि ये छोटे- छोटे बच्चे घर के जानवरों की देखभाल का काम करने के बाद खेल- खेल में खूबसूरत मूर्तियाँ बनाते हैं तो वे उनसे मिलने पहुंचे। उनके बनाए छोटे- छोटे मूर्तियों को देख कलाकार जी बहुत प्रभावित हुए। इन्होंने इन बच्चों को प्रशिक्षण देने की सोची लेकिन उस रिश्तेदार ने मना कर दिया। इन बच्चों की दयनीय हालत देख कर इनका हृदय द्रवित हो गया। कई तरह के प्रयास के बाद अंततः इन्हें अपने घर लाकर खुद इनकी देख-भाल की, स्कूल में दाखिल करवाया तथा मूर्तिकला का भी प्रशिक्षण दिया। आज ये दोनों भाई मूर्तियाँ बनाने का काम कर अपने पैरों पर खड़े हैं और खुश हैं। अपने इस तरह के कार्यों के एवज में इन्होंने कभी कुछ नहीं चाहा।
कला भवन में जो प्रशिक्षण का काम चलता था उससे भी इन्हें किसी तरह का आर्थिक लाभ नहीं मिलता था। कला का प्रचार प्रसार ही इनका उद्देश्य था। आज भी अपने घर में जो प्रशिक्षण कार्य करते हैं वह भी किसी आर्थिक कारणों से नहीं है। इनका मानना है कि व्यक्ति चाहे किसी भी विधा को अपनाए यदि उसे कला कि जानकारी है तो वह एक सफल, कलात्मक एवं आनंदमय जीवन जी सकता है।
पूर्णिया जैसे दूर दराज के इलाके में जहां कला की जागरूकता सामान्य जनों में नहीं थी, ऐसे में कला के प्रति रुझान पैदा करना, कला को दैनंदिन जीवन से जोड़ने तथा बच्चों एवं युवाओं को कला की तरफ आकर्षित करना आसान कार्य नहीं था। इस शहर को कला से परिचय कराने में कलाकार जी का एक महत्वपूर्ण योगदान है। आज उनके सान्निध्य में रहे बहुत से छात्र कला के अध्ययन के लिए पूर्णिया से देश के विभिन्न कला संस्थानों में गए और जो नहीं भी गए वे भी कला में रुचि रखते हुए एक सफल एवं कलात्मक जीवन जी रहे हैं । हमारे देश में कलाकार जी की तरह न जाने कितने ऐसे कलाकार हैं जो बिना किसी स्वार्थ के कला की सच्ची सेवा कर रहे हैं जिनसे कला जगत को सबक लेने की जरूरत है।
संजय सिंह, बेंगलोर, sanjaysinghji@gmail.com

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