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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    लोक-लुभावन नहीं यह तो देश का बजट है

    By February 2, 2018Updated:February 2, 2018 Hot issue No Comments6 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    देश के वित्त मंत्री ने वर्ष 2019 में होने वाले आम चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट पेश किया है। वर्त्तमान सरकार से ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि यह बजट लोक-लुभावन होगा लेकिन वर्त्तमान सरकार का झुकाव देश के उन किसानों और ग्रामीण इलाक़ों को राहत देने की ओर ज्यादा था। इस बात में कोई दो राय नहीं कि देश के बदहाल कृषि क्षेत्र को समर्थन देना आर्थिक एवं नैतिक रूप से परम आवश्यक है।

    देश के वर्त्तमान समय का वित्तमंत्री द्वारा वर्ष 2018-19 के लिए संसद में पेश किये गए बजट में सरकार द्वारा अगले वित्तीय वर्ष की अनुमानित आय एवं खर्च का ब्योरा पेश किया है। किसी भी सरकार के आय का प्रमुख स्रोत उत्पाद शुल्क एवं वर्त्तमान में सेवा कर जैसे करों से होता है। लेकिन इस समय इन दोनों करों का जीएसटी में विलय हो जाने से बजट का दायरा अवश्य छोटा हो जाने के बावजूद वर्त्तमान समय संसद में पेश हुए बजट का महत्व कम हो गया है क्योकि बजट में पेश होने वाले आंकड़े में अनुमानित मात्र होते हैं जिसके कारण इसमें किसी भी तरह के सरकारी प्राप्तियां एवं खर्चों की अनुमान से ऊपर या नीचे होना स्वाभाविक सी बात हैं। संसद में पेश होने वाले बजट से देश के आगामी वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की आर्थिक नीतियों की दशा-दिशा स्पष्ट हो जाती है। मौजूदा समय हमें यह भी देखने की जरूरत है कि देश के समक्ष मौजूदा समय में उपस्थित चुनौतियों से मौजूदा वित्त मंत्री किस प्रकार से निपटते है।

    वर्त्तमान समय में देश की अनेकों आर्थिक गतिविधियां के हिस्सा लेने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां आगे आ रही हैं। इन कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें यह भी छूट होगी कि वे अपना मुख्यालय अपनी इच्छानुसार किसी भी जगह पर स्थापित कर सकते है। संपूर्ण दुनिया से हुई आमदनियों पर ऐसी कंपनियां अपने ही देश जहाँ पर कम्पनी का मुख्यालय इस्थित होगा वही पर अपना आयकर अदा करती है जिस वजह से एसे कंपनियों से भारतीय सरकार को आयकर का फायदा तो नहीं मिल पायेगा, जैसे कम्पनी का मुख्यालय यदि इंग्लैण्ड में होगा तो उसके द्वारा अर्जित आय पर वह कम्पनी इंग्लैंड में ही अपना आयकर दाखिल करेगी। ऐसी स्थिति में हम भारतीय कंपनियों को अपना मुख्यालय भारत में ही बनाए रखने के लिए उन्हें तरह -तरह के पैकेजों से प्रेरित करने के अलावा भारत में इन कंपनियों द्वारा अदा किए जाने वाले कारपोरेट करों की दरों को भी न्यूनतम बनाये रखना होगा।

    जैसा की हमारे वित्त मंत्री द्वारा वादा किया गया था कि कारपोरेट कर के दरों में 30 प्रतिशत से चरणबद्ध तरीकों से घटा कर 25 प्रतिशत कर देंगें वही पर वित्त मंत्री के समक्ष यह भी चुनौती है कि वे वैश्वीकरण से पीछे हटें जिससे भारतीय कंपनियों द्वारा यहीं पर कर अदा करना अनिवार्य बनाया जाए या फिर देश में कारपोरेट कर की दरों को भी कम कर दिया जाये। लेकिन दूसरी चुनौती के रुप में बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने एवं सरकारी खपत घटाने का भी प्रयास किया जाना चाहिए। वर्तमान समय में सरकार को जीएसटी कम मिलने से सरकारी इकाइयों के शेयरों की भारी मात्रा में बिक्री मिली रकम का उपयोग निवेश के लिए किया जाए, न कि सरकारी खपत के लिए।

    यदि हम तीसरी चुनौती के रूप में वर्त्तमान समय में पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले टैक्स की बात करते है तो उत्पादन शुल्क को भले ही जीएसटी में शामिल कर लिया गया हो, वही पर पेट्रोलियम उत्पाद वस्तुओं के जीएसटी के दायरे में नहीं आने से इन पर ड्यूटी का निर्धारण वित्त मंत्री स्वमं अपने विवेकानुसार करते हैं। वर्त्तमान समय में पेट्रोल, डीजल के दामो में बढ़ोत्तरी होते रहने से अब यह मांग उठने लगी कि तेल पर लागू एक्साइज ड्यूटी में कटौती की जाए जिससे उपभोगताओं को राहत मिले। अब यहाँ यह प्रश्न उठता है कि वित्त मंत्री तेल पर एक्साइज ड्यूटी को बढ़ाएंगे, घटाएंगे या बनाए रखेंगे? वर्त्तमान समय में हमारे देश में आयातित सामग्रियों में तेल का हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत होने से तेल के आयात करने के कारण पर्याप्त मात्रा में विदेशी मुद्रा डॉलर नहीं कमा पा रहे हैं। एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने से देश में पेट्रोल के दाम बहुत बढ़ जाने से खपत में कमी होगी एवं विदेशी व्यापार में घाटा भी कम होगा। इसके ठीक विपरीत एक्साइज ड्यूटी के घटाने पर  पेट्रोल के दामों के कमी होने से खपत में न्यूनतम कमी होगी जिसकी वजह से विदेशी व्यापार घाटा भी बढ़ता रहेगा

    आज जरूरत इस बात कि है कि हम घरेलू आयातों को कम करे जिससे हमारे घरेलू उद्योगों को संरक्षण मिलेगी।
    हमारी चौथी चुनौती में देश के छोटे उद्योगों को पुनर्जीवित करने की है। आज हमारे वर्तमान समय में देश की आर्थिक विकास दर मंद है जबकि शेयर बाजार भाव में उछाल आ रहा है। वही देश में नोटबंदी तथा जीएसटी जैसे फैसलों के लागू किये जाने के बाद से मुख्यतः देश के छोटे उद्योग हतप्रद हैं। इन छोटे उद्योग के सुस्त पड़ जाने के कारण बड़ी कंपनियों को अपने कारोबार के लिए खुला मैदान मिल गया है वहीं पर छोटे उद्योगों के सुस्त होने की वजह से अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है और बड़े उद्योगों को खुला मैदान मिलने जाने से शेयर बाजार में उछाल आरहा है। इस तरह की इस्थितियों का अंत कष्टकारी शिद्ध होती है।

    यदि देश के छोटे एवं कुटीर उद्योगों समाप्त हो जाएंगे तो इस दशा में बड़ी कंपनियों का माल कौन खरीदेगा? देश में अधिकांश रोजगार छोटे एवं कुटीर उद्योगों द्वारा ही सृजित किए जाते रहे हैं। येसी अवस्था में देश में रोजगार के अवसरों के घटने से अनेको तरह की गंभीर समस्याएं पैदा होंगी इसीलिए छोटे उद्योगों को जीवित रखना भी बहुत आवश्यक है, इसके मद्देनजर वित्त मंत्री कुछ आवश्यक कदम उठा सकते हैं। इससे पहले छोटे उद्योगों के लिए कुछ वस्तुएं आरक्षित हुआ करती थीं एवं उन वस्तुओं का बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादन करना प्रतिबंधित था। वर्त्तमान समय में वित्त मंत्री के सामने इस बात की चुनौती है कि देश के छोटे उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए वे कौन से कारगर कदम उठाएंगे।

    पांचवीं चुनौत में देश में एक लंबे समय से जारी किसानों की समस्याओं से उन्हें मुक्ति दिलाने की होगी।
    अभी तक इस क्षेत्र में किये गए सभी तरह के प्रयासों का परिणाम संतोषप्रद नहीं रहे। वर्त्तमान सरकार का ऐसा प्रयास है कि कृषि उत्पादन को बढ़ाया जाए जिससे किसान की आय में बढ़ोत्तरी हो सके लेकिन हो रहा है ठीक इसके विपरीत। उत्पादन बढ़ने के साथ ही साथ दाम भी घट जाते हैं एवं अधिक उत्पादन किसान के लिए अभिशप्त हो जाता है। इस तरह के समस्या से निपटने का एक ही मात्र उपाय है कि वर्तमान में उर्वरक, सिंचाई एवं खाद्यान्न पर जो छूट दी जा रही है उस छूट को सीधे किसानो के खाते में डाल दिया जाए। केंद्र सरकार द्वारा इन मदों पर लगभग 5 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष की छूट दी जा रही है। इस रूपये को दस करोड़ किसानों के परिवारों में 50 हजार रुपये प्रति वर्ष के हिसाब से देकर भोले भाले किसानों को आत्महत्या करने के लिए बाध्य नहीं होना पड़ेगा।
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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