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    गोदी मीडिया के फायरब्रांड चेहरों ने टीआरपी के लिए करा ली फजीयत, मांगनी पड़ी माफ़ी, जनता का भरोसा भी तोड़ा

    ShagunBy ShagunMay 10, 2025Updated:May 10, 2025 ब्लॉग No Comments9 Mins Read
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    दिलीप राय शर्मा

    कम से कम सेना की रिपोर्टिंग के मामले में तो ख्याल रखते

    हाल ही में, 8 मई 2025 की रात को कुछ भारतीय न्यूज़ चैनलों ने सनसनीखेज़ और अपुष्ट खबरें प्रसारित कीं, जिनमें दावा किया गया कि भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर हमले किए, इस्लामाबाद पर कब्ज़ा कर लिया, कराची पोर्ट तबाह हो गया, और यहाँ तक कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख को गिरफ्तार कर लिया गया। ये खबरें इतनी तेज़ी से फैलीं कि सोशल मीडिया पर युद्ध जैसे माहौल की अफवाहें उड़ने लगीं। अगले दिन, भारतीय सेना के अधिकारियों को इन खबरों का खंडन करना पड़ा, और कुछ चैनलों को अपनी गलती स्वीकार कर सार्वजनिक माफी माँगनी पड़ी। इस घटना ने एक बार फिर “गोदी मीडिया” की विश्वसनीयता और टीआरपी की अंधी दौड़ पर सवाल खड़े किए हैं। आइए, इस मुद्दे को समझते हैं कि गोदी मीडिया फेक न्यूज़ क्यों फैलाता है, कौन से चैनल इस बार माफी माँगने को मजबूर हुए, और टीआरपी की इस दौड़ के पीछे क्या कारण हैं।

    गोदी मीडिया क्या है?

    “गोदी मीडिया” एक निंदात्मक शब्द है, जिसे पत्रकार रवीश कुमार ने लोकप्रिय बनाया। यह उन भारतीय प्रिंट और टीवी न्यूज़ चैनलों को संदर्भित करता है, जो केंद्र सरकार के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं। इन चैनलों पर अक्सर सनसनीखेज़, अपुष्ट, और भड़काऊ खबरें चलाने का आरोप लगता है, जो सरकार के एजेंडे का समर्थन करती हैं और जनता में भय, राष्ट्रवाद, या ध्रुवीकरण का माहौल बनाती हैं।

    क्या था 8 मई 2025 की रात का तमाशा

    • 8 मई 2025 की रात को, कुछ प्रमुख न्यूज़ चैनलों ने पाकिस्तान के खिलाफ कथित सैन्य कार्रवाई को लेकर अतिशयोक्तिपूर्ण और अपुष्ट खबरें चलाईं। इनमें शामिल थे:
    • आजतक: दावा किया गया कि भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर बड़े पैमाने पर हमले किए।
    • टाइम्स नाउ नवभारत: इस्लामाबाद पर कब्ज़े और कराची पोर्ट के तबाह होने की खबरें चलाईं।
    • ज़ी न्यूज़: पाकिस्तानी सेना प्रमुख की गिरफ्तारी जैसे सनसनीखेज़ दावे किए।
    • सुदर्शन न्यूज़: युद्ध जैसे माहौल को बढ़ावा देने वाली हेडलाइंस चलाईं।
    • TV9 भारतवर्ष और ABP न्यूज़: इन चैनलों ने भी इसी तरह की अपुष्ट खबरें प्रसारित कीं।

    इन खबरों का कोई प्रामाणिक स्रोत नहीं था, और भारतीय सेना ने अगले दिन इन दावों का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद, आजतक सहित कुछ चैनलों ने अपनी गलती स्वीकार की और फैक्ट-चेक के ज़रिए वायरल वीडियो और खबरों को फेक बताया।

    क्यों फैलता है गोदी मीडिया फेक न्यूज़?

    गोदी मीडिया द्वारा फेक न्यूज़ फैलाने के पीछे कई कारण हैं, जो सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक कारण हो सकते हैं:

    टीआरपी की अंधी दौड़:

    • टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट्स (टीआरपी) न्यूज़ चैनलों की आय का प्रमुख स्रोत हैं, क्योंकि विज्ञापनदाता अधिक दर्शकों वाले चैनलों को प्राथमिकता देते हैं। सनसनीखेज़ खबरें, जैसे युद्ध या आतंकवाद से जुड़ी हेडलाइंस, दर्शकों का ध्यान तुरंत खींचती हैं।
    • 8 मई की रात की कवरेज इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ चैनलों ने बिना तथ्यों की जाँच किए युद्ध जैसा माहौल बनाया, क्योंकि ऐसी खबरें दर्शकों को टीवी स्क्रीन से चिपकाए रखती हैं।

    राजनीतिक दबाव और कॉर्पोरेट हित:

    1. कई न्यूज़ चैनलों के मालिक बड़े कॉर्पोरेट घराने हैं, जो सरकार के साथ गहरे आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते रखते हैं। ये चैनल सरकार के प्रति वफादारी दिखाने के लिए सत्ताधारी पार्टी के एजेंडे को बढ़ावा देते हैं, चाहे वह राष्ट्रवाद हो या पड़ोसी देशों के खिलाफ माहौल बनाना।
    2. उदाहरण के लिए, रवीश कुमार ने 2017 में अडानी समूह द्वारा ईपीडब्ल्यू पत्रिका को कानूनी नोटिस भेजे जाने की घटना का ज़िक्र किया, जिसमें कॉर्पोरेट दबाव के कारण पत्रकार को इस्तीफा देना पड़ा।
    3. राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण का हथियार: गोदी मीडिया अक्सर पाकिस्तान, आतंकवाद, या अल्पसंख्यकों जैसे मुद्दों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है ताकि राष्ट्रवादी भावनाएँ भड़कें और जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों (जैसे बेरोज़गारी, महंगाई) से हटे।
    4. 8 मई की कवरेज में पाकिस्तान के खिलाफ अपुष्ट खबरें चलाकर चैनलों ने राष्ट्रवाद की भावना को भुनाने की कोशिश की, लेकिन जब खबरें फेक साबित हुईं, तो उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
    5. पत्रकारिता के नैतिक पतन: कई न्यूज़ चैनलों में पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों, जैसे तथ्यों की जाँच और निष्पक्षता, को ताक पर रख दिया गया है। एंकर और पत्रकार सनसनीखेज़ खबरों को सच के रूप में पेश करते हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य दर्शकों को बाँधे रखना होता है, न कि सत्य को सामने लाना।
    6. उदाहरण के लिए, 2020 में फेक टीआरपी घोटाले में रिपब्लिक टीवी जैसे चैनलों का नाम सामने आया, जिसने दिखाया कि टीआरपी बढ़ाने के लिए चैनल गलत तरीकों का सहारा लेते हैं।
    7. सोशल मीडिया और वायरल कंटेंट का दबाव: डिजिटल युग में, न्यूज़ चैनल सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली खबरों को जल्दबाज़ी में उठा लेते हैं, बिना उनकी सत्यता जाँच किए। 8 मई की रात को वायरल हुए फेक वीडियो और पोस्ट को कई चैनलों ने आधार बनाया, जिसके कारण माफी माँगनी पड़ी।

    कौन से चैनल माफी माँगने को मजबूर हुए?

    8 मई 2025 की रात की फेक न्यूज़ कवरेज के बाद, निम्नलिखित चैनलों ने अपनी गलती स्वीकार की और माफी माँगी या फैक्ट-चेक के ज़रिए खबरों का खंडन किया:
    आजतक: अपनी फैक्ट-चेक टीम के ज़रिए वायरल वीडियो को फेक घोषित किया और स्पष्ट किया कि ऐसी कोई सैन्य कार्रवाई नहीं हुई।

    ABP न्यूज़: अपुष्ट खबरों को चलाने के लिए माफी माँगी और अपनी कवरेज को सही करने की कोशिश की।

    टाइम्स नाउ नवभारत और ज़ी न्यूज़: इन चैनलों ने भी अपनी हेडलाइंस को वापस लिया और गलती स्वीकार की, हालाँकि उनकी माफी को सोशल मीडिया पर पर्याप्त नहीं माना गया।

    हालाँकि, सुदर्शन न्यूज़ और TV9 भारतवर्ष जैसे कुछ चैनलों ने माफी माँगने के बजाय अपनी कवरेज को सही ठहराने की कोशिश की, जिसके कारण उनकी आलोचना और बढ़ी।

    पहले भी फेक न्यूज़ के उदाहरण

    गोदी मीडिया का फेक न्यूज़ फैलाने का इतिहास पुराना है। कुछ उल्लेखनीय उदाहरण:
    2020-21 किसान आंदोलन: कई चैनलों ने किसानों को “खालिस्तानी” और “देशद्रोही” बताकर बदनाम करने की कोशिश की, बिना किसी ठोस सबूत के। रवीश कुमार ने इसे “फूट डालने” की रणनीति करार दिया।

    फेक टीआरपी घोटाला (2020): रिपब्लिक टीवी पर टीआरपी बढ़ाने के लिए दर्शक संख्या में हेरफेर करने का आरोप लगा, जिसके बाद इंडिया टुडे ग्रुप को भी सफाई देनी पड़ी।

    कोरोना काल में गलत सूचनाएँ: कुछ चैनलों ने कोविड-19 के इलाज और वैक्सीन को लेकर अपुष्ट दावे किए, जिससे जनता में भ्रम फैला।

    सुशांत सिंह राजपूत केस (2020): कई चैनलों ने इस केस को सनसनीखेज़ बनाकर अपुष्ट कहानियाँ चलाईं, जिसका कोई ठोस आधार नहीं था।

    टीआरपी की दौड़ का विश्लेषण

    आर्थिक दबाव: न्यूज़ चैनलों का खर्चा विज्ञापनों से चलता है, और विज्ञापनदाता केवल उच्च टीआरपी वाले चैनलों में निवेश करते हैं। इससे चैनल सनसनीखेज़ खबरों की ओर भागते हैं।

    दर्शकों की माँग: भारतीय दर्शक अक्सर भावनात्मक और सनसनीखेज़ कंटेंट की ओर आकर्षित होते हैं, जैसे युद्ध, आतंकवाद, या धर्म से जुड़े मुद्दे। चैनल इस माँग को भुनाते हैं।

    प्रतिस्पर्धा: सैकड़ों न्यूज़ चैनलों के बीच अपनी पहचान बनाए रखने के लिए, चैनल एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में गलत खबरें भी चलाते हैं।

    नैतिकता का अभाव: टीआरपी के चक्कर में चैनल पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों को भूल जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप फेक न्यूज़ का प्रसार होता है।

    इसका प्रभाव और समाधान

    • विश्वसनीयता का ह्रास: गोदी मीडिया की गलत खबरों से जनता का मीडिया पर भरोसा कम हुआ है।
    • सामाजिक ध्रुवीकरण: फेक न्यूज़ से समाज में नफरत और विभाजन बढ़ता है, जैसे कि किसान आंदोलन या धार्मिक मुद्दों पर गलत कवरेज से हुआ।
    • राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा: 8 मई की तरह अपुष्ट युद्ध की खबरें देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं, क्योंकि ये गलत सूचनाएँ अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ा सकती हैं।
    • लोकतंत्र पर हमला: रवीश कुमार के अनुसार, गोदी मीडिया सरकार से सवाल पूछने के बजाय जनता को दोषी ठहराता है, जिससे लोकतंत्र कमज़ोर होता है।

    समाधान:

    • मजबूत नियमन: न्यूज़ चैनलों के लिए सख्त नियम और तथ्य-जाँच की अनिवार्यता लागू की जानी चाहिए।
    • दर्शकों की जागरूकता: जनता को फेक न्यूज़ की पहचान करने और विश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा करने के लिए शिक्षित करना ज़रूरी है।
    • स्वतंत्र पत्रकारिता को बढ़ावा: यूट्यूब और स्वतंत्र वेबसाइटों पर सक्रिय निर्भीक पत्रकारों को समर्थन देना चाहिए, जो गोदी मीडिया का विकल्प बन सकते हैं।
    • टीआरपी सिस्टम में सुधार: टीआरपी की गणना को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाया जाना चाहिए ताकि चैनल सनसनीखेज़ खबरों पर निर्भर न रहें।

    8 मई 2025 की रात गोदी मीडिया की गैर-ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता का एक और उदाहरण बन गई, जब आजतक, ज़ी न्यूज़, टाइम्स नाउ नवभारत, और अन्य चैनलों ने पाकिस्तान के खिलाफ अपुष्ट खबरें चलाकर युद्ध का माहौल बनाया। माफी माँगने के बावजूद, इन चैनलों की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल उठा है। टीआरपी की दौड़, राजनीतिक दबाव, और पत्रकारिता के नैतिक पतन ने गोदी मीडिया को फेक न्यूज़ का पर्याय बना दिया है। यह न केवल जनता को गुमराह करता है, बल्कि लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इस समस्या से निपटने के लिए सख्त नियमन, दर्शक जागरूकता, और स्वतंत्र पत्रकारिता को बढ़ावा देना ज़रूरी है। जब तक चैनल टीआरपी के लिए सच को ताक पर रखेंगे, ऐसी घटनाएँ बार-बार सामने आती रहेंगी।

    क्या बोले यूजर्स :

    1. Amit Thakur@amit113thaku : जनाब जहां सजा का कोई प्रावधान ना हो वहां ऐसी माफी का क्या ही फायदा! उन्होंने जो डैमेज करना था कर दिया।
    2. Neeraj Singh @N____Singh : भारतीय सेना से अनुरोध है कृपया एक एक मिसाइल न्यूज चैनलों पर मरने का कस्ट करे।
    3. Anil Kumar Chaudhary @AnilKum18180386 : जी सर पता चला लेकिन केवल माफी से काम चला देना जनता के साथ धोखा है क्योंकि यह माफी के लायक बच्चे नहीं हैं | रोज गद्दारी ही करते हैं कम से कम युद्ध के समय तो ईमानदार हो जाते , देश के प्रति।
    4. RUPENDRA KUMAR PRAJAPATI @RUPENDR45476510 : ये भारत के लिए एक अजीब बात है एक तरफ देश में जंग का ऐलान होने जैसा माहौल हैं ऐसी स्तिथि में जनता बंद घरों से सिर्फ मीडिया पर भरोसा करती है और मीडिया देखो 2 घंटे में इतना फेक दिया कि सुबह माफी भी मांग ली हद है। जय हिंद
    5. Dr Tanishq @Nareshsapela5 : भारतीय मीडिया में इतने नालायक पत्रकार भरे पड़े हैं कि वक्त आने पर कब पलटी मार जाए पता ही नहीं चले।
      वक्त आ गया है इनको उनकी सही जगह दिखाई जाए। TRP के चक्कर में बिना सोचे समझे कुछ भी दिखा देते है बोल जाते हैं। भारत सरकार को इन मूर्ख मीडिया वालों पर लगाम लगानी जरूर चाहिए। 
    6. Hemprasad Jagat @hemprasad_J : दो तीन दिन से आपका ही पोस्ट पढ़ रहा हूं.बाकी गोदी मीडिया पर तो बहुत सालों से भरोसा उठ गया हैं।

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