संतवाणी : अजीत कुमार सिंह
वन के मार्ग में प्रभु श्री राम आगे चल रहे हैं। पीछे लक्ष्मण जी चल रहे हैं दोनों ही तपस्वी वेश बनाए हुए अति सुन्दर लग रहे हैं उन दोनों के बीच सीता जी इस प्रकार शोभा दे रहीं हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया यहाँ तुलसीदास जी ने वेदान्त के गूढतम रहस्यों को उजागर किया है ब्रह्म और जीव दोनों एक है परन्तु माया के कारण जीव स्वयं को ब्रह्म से अलग समझने लगता है।

आगे और गहराई से समझाते हुए तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता जी प्रभु श्री राम के चरण चिन्हों के बीच में अपने चरण रखती हैं और उनसे भयभीत रहने की लीला करती हैं इधर लक्ष्मण जी सीता राम जी दोनों के चरण बचाकर अपने कदम रखते हैं इसका भावार्थ क्या है? इसका भावार्थ है कि प्रभु श्री राम परमात्मा का प्रतीक हैं सीता जी माया का और लक्ष्मण जी जीव का प्रतीक हैं माया सदा प्रभु से भयभीत रहती है और उसका काम है।
परमात्मा में भेद पैदा करना परन्तु वो परमात्मा को अपने अधीन नहीं कर सकती इसीलिए अपने चरण उनसे अलग रखती है इधर जीव जो कि परमात्मा में दृढ भक्ति रखता है वो माया और परमात्मा दोनों को (दोनों के चिन्हों को ) भली प्रकार पहचानता है इसलिए माया के पदचिन्हों पर वो चलता नहीं और प्रभु का सेवक होने से प्रभु के चरणों पर पैर रखता नहीं अब इन चरण चिन्हों का क्या रहस्य है।
ये भी बताया जाता है जिस प्रकार मिट्टी में बने चरण चिन्ह तत्त्व दृष्टि से देखने पर मिट्टी के अतिरिक्त और कुछ नहीं, अर्थात कितना भी अनुसन्धान कर लें अंत में निर्णय यही निकलता है कि ये मिट्टी ही है जो चरण चिन्हों के रूप में प्रतीत हो रही है ठीक उसी प्रकार, ब्रह्म ही माया और जीव जगत आदि के रूप में प्रतीत हो रहा है वास्तव में तीनों में कोई भेद नहीं है सब कुछ एक परब्रह्म परमात्मा ही है बस यही परम गूढ़ रहस्य इस लीला के द्वारा दर्शाया गया है।
इस प्रकार (राम लखन सिया प्रीती सुहानी) ब्रह्म, जीव और भक्ति को एक जानकार पंछी (भक्त) और मृग (ज्ञानमार्ग पर चलने वाले) प्रभु श्री सीता राम जी की मनोहारी छवि आनंद से निहार रहें हैं तुलसीदास जी कहते हैं कि जो कोई भी प्रभु श्री सीता राम लखन जी के इस पथिक रूप को देख लेता है और समझ लेता है वो इस महा कठिन भवमार्ग को भी आनंद सहित बिना ही किसी श्रम के पार कर लेता है।







