देश में सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ाने वाली प्रमुख प्रवृत्तियों में एक किसी भी दिक्कत पर अपने हिसाब से दवाएं लेना भी है। ऐसा करने वालों में बुजुर्ग लोग अधिक हैं। इस बारे में एक अध्ययन का कहना है कि देश में सौ में से अट्ठाइस बुजुर्ग अनावश्यक और गलत दवाएं ले रहे हैं। पांच में से एक बुजुर्ग डॉक्टर की राय के बिना दवा लेता है जबकि आधे से ज्यादा बुजुर्ग पेनकिलर्स अपनी इच्छा से लेते हैं। इसके अलावा हर तीन में एक बुजुर्ग एंटीबायोटिक्स बिना देखरेख के लेता है जिसका नतीजा यह है कि जब शरीर को ऐसी दवाओं की जरूरत होती है तब ये काम नहीं करतीं ।
यह देखते हुए कि भारत में वृद्धों की संख्या ग्यारह प्रतिशत से अधिक है और इनका बड़ा हिस्सा दवाओं पर ही निर्भर रहता है, ये तथ्य काफी गंभीर है जो बुजुर्ग अकेले रहते हैं, उनमें मन मुताबिक दवाएं लेने की प्रवृत्ति ज्यादा बढ़ जाती है। पुराने मरीज भी अपने हिसाब से दवाएं लेकर खुद की हालत और बिगाड़ लेते हैं। उदाहरण के लिए सिरदर्द और बुखार भले सामान्य समस्याएं हों पर दोनों की अलग-अलग वजहें हो सकती हैं और दोनों में एक ही दवा कतई काम नहीं करेगी। इस अवस्था में कई सामान्य और गंभीर बीमारियां होती रहती हैं तो ये लोग अपने मन मुताबिक दवाएं लेने लगते हैं।
उन्हें लगता है कि इसी दवा ने पहले ठीक किया है तो इस बार भी कारगर होगी। जबकि लक्षण के आधार पर दवा का निर्धारण उपचार का मुख्य सिद्धांत है जिसके बारे में योग्य चिकित्सक ही बता सकता है। इसलिए जरूरी है कि अपने निर्णय के अनुसार दवा लेने की आदत पर अंकुश लगाया जाए। बेहतर यही होगा कि थोड़ी अतिरिक्त परेशानी और खर्चा उठा कर चिकित्सक की सलाह ली जाए और उसी के अनुसार दवा का सेवन किया जाए।







