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    Home»ज़रा हटके

    लाचार हरीश राणा : यह इच्छा मृत्यु है या हमारी व्यवस्था की विफलता?

    ShagunBy ShagunMarch 19, 2026Updated:March 19, 2026 ज़रा हटके No Comments6 Mins Read
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    Helpless Harish Rana: Is this a plea for euthanasia, or a failure of our system?
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    ashok bajpaiआलोक बाजपेयी

    गाजियाबाद के श्री हरीश राणा कथित रूप से वर्षों से ‘कोमा’ में रहने के बाद, सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से ऐम्स AIIMS, नई दिल्ली में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। डॉक्टरों ने उनका लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया फिर फीडिंग ट्यूब हटाकर भोजन देना बंद किया और अब कई घंटों से पानी देना भी बंद कर दिया है. हमारा सिस्टम इस तरह बिना भोजन और पानी के मार डालने को ‘सम्मानजनक मृत्यु’ कह रहा है। श्री हरीश राणा का मामला अब भारतीय समाज, न्यायपालिका और चिकित्सा व्यवस्था तीनों के सामने गहरे प्रश्न खड़े करता है. क्या यह वास्तव में ‘इच्छा मृत्यु’ है—या फिर एक ऐसी प्रक्रिया, जो कानूनी आवरण में छिपी हुई जबरन मृत्यु (forced death) का रूप ले सकती है? ऐसे किसी को मृत्यु की ओर ढकेलना किसी भी संवेदनशील इंसान के रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है। एक आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या किसी को बिना भोजन-पानी के तड़पाकर मारना न्याय है? यदि हम एक राष्ट्र के रूप में इस प्रक्रिया को मूक दर्शक बनकर देख रहे हैं, तो हमें अपनी मनुष्यता को जाँचने की सख़्त ज़रूरत है। क्या हमारी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ इतनी पंगु हो चुकी हैं कि एक लाचार मरीज़ को पनाह नहीं दे सकतीं? यदि आर्थिक और शारीरिक अक्षमता के कारण किसी को मरने के लिए छोड़ दिया जाए, तो यह न्याय नहीं, बल्कि राज्य की विफलता है।

    दोषपूर्ण आधार पर फ़ैसला : कोमा में नहीं है श्री हरीश राणा

    किसी भी न्यायिक निर्णय की नींव तथ्यों पर टिकी होती है। श्री हरीश राणा के मामले में बार – बार झूठ बताया जा रहा है कि वह 12 वर्षों से कोमा में है. न्यायिक निर्णय का आधार ही यदि त्रुटिपूर्ण हो—तो पूरा निर्णय नैतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर संदिग्ध हो जाता है। चिकित्सकीय विज्ञान में “कोमा” एक अत्यंत विशिष्ट अवस्था है—जहाँ व्यक्ति बाहरी उत्तेजनाओं के प्रति लगभग पूर्णतः अचेत रहता है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति – सुन और समझ सकता है, आँखों से प्रतिक्रिया दे रहा है और अस्पष्ट शब्दों में बोलने का प्रयास कर रहा है, तो वह कोमा में नहीं, बल्कि किसी अन्य न्यूरोलॉजिकल या शारीरिक अक्षमता से जूझ रहा है। यह अंतर केवल तकनीकी नहीं है बल्कि यह जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा है।

    कानूनी परिप्रेक्ष्य: जीवन का अधिकार बनाम गरिमामय मृत्यु

    भारत में इच्छा मृत्यु पर सर्वोच्च न्यायालय ने सीमित परिस्थितियों में “पैसिव यूथेनेशिया” (Passive Euthanasia) की अनुमति दी है—विशेष रूप से Aruna Shanbaug case (2011) और बाद के निर्णयों में। इसके अंतर्गत – जीवनरक्षक उपकरण हटाए जा सकते हैं, लेकिन यह निर्णय कठोर प्रक्रियाओं और चिकित्सकीय प्रमाणों के आधार पर होता है. सबसे महत्वपूर्ण—यह “मृत्यु देने” का नहीं, “प्राकृतिक मृत्यु को होने देने” का सिद्धांत है। यहाँ एक बुनियादी अंतर है : Natural death vs Induced death. यदि किसी व्यक्ति को भोजन और पानी से वंचित किया जाता है, तो यह केवल उपचार हटाना नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से जीवन समाप्त करने की प्रक्रिया है।

    मानवीय और नैतिक प्रश्न: क्या भूख और प्यास से मरना ‘गरिमामय’ है?

    किसी भी सभ्य समाज में “गरिमामय मृत्यु” का अर्थ है – दर्द रहित, मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप सम्मानजनक मृत्यु। लेकिन भोजन और जल से वंचित कर धीरे-धीरे मृत्यु की ओर धकेलना—क्या यह उस परिभाषा में आता है? यहाँ एक असहज तुलना उभरती है—हम पशुओं के लिए भी “humane slaughter” की बात करते हैं. मुर्गियों और जानवरों तक के लिए दर्दरहित मृत्यु की बात करने वाले समाज में एक इंसान को सूख-सूख कर मरने के लिए क्यों छोड़ दिया गया है? एक जीवित, संवेदनशील मानव के लिए हमारे मानक क्या पशुओं से भी बदतर हैं ?

    समाज और राज्य की विफलता का असली सवाल
    इस पूरे मामले के सबसे स्याह और महत्वपूर्ण पहलू पर न्यायालय, सरकारें और समाज मौन हैं। यदि कोई व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह अक्षम हो जाता है, तो क्या उसे स्वाभाविक मृत्यु तक सम्मानपूर्वक जीवित रखने की ज़िम्मेदारी इस 140 करोड़ के देश और उसके कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की नहीं है? श्री हरीश के माता-पिता बूढ़े हो चुके हैं, आर्थिक रूप से टूट चुके हैं और अब अपने बेटे की देखभाल करने में असमर्थ हैं। उन्होंने अपने बेटे के लिए ‘इच्छा मृत्यु’ इसलिए नहीं माँगी क्योंकि वे उससे प्यार नहीं करते, बल्कि इसलिए माँगी क्योंकि व्यवस्था ने उन्हें पूरी तरह से अकेला छोड़ दिया। क्या हमारी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं इतनी पंगु हो चुकी हैं कि एक लाचार मरीज को पनाह नहीं दे सकतीं? यदि आर्थिक और शारीरिक अक्षमता के कारण किसी को मरने के लिए छोड़ दिया जाए, तो यह न्याय नहीं, बल्कि राज्य की, स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा तंत्र की विफलता है।

    कार्टून सोशल मीडिया से साभार

    खतरनाक नज़ीर (Precedent) का जोखिम

    यदि इस प्रकार के निर्णय बिना ठोस और निर्विवाद चिकित्सा प्रमाणों के लिए जाने लगें, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. जैसे – गरीब और असहाय लोगों पर दबाव, परिवारों द्वारा “बोझ” समझे जाने वाले रोगियों के लिए खतरा और संस्थागत स्तर पर जीवन का अवमूल्यन। कानून में नज़ीर या “precedent” अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एक गलत उदाहरण, भविष्य में अनेक गलत निर्णयों का आधार बन सकता है। यदि हम श्री हरीश राणा की मृत्यु को चुपचाप देखते रहे तो अगले कई हरीश राणा अख़बारों की डैश न्यूज़ भी नहीं बनेंगे और ऐसी मृत्यु सामान्य घटना या new normal बन जायेगी।

    कानून से परे : मानवता का प्रश्न

    कानून आवश्यक है, लेकिन मानवता—उससे भी ऊपर का मूल्य है। यदि कोई व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सकता, तब भी: उसका जीवन मूल्यहीन नहीं हो जाता। उसकी निर्भरता उसे अधिकारों से वंचित नहीं करती और मृत्यु का पात्र नहीं बनाती।

    निष्कर्ष: इंसान होना बनाम इंसानियत दिखाना

    इंसान होना ही काफी नहीं है, इंसानियत नज़र भी आनी चाहिए और उसे बचाया भी जाना चाहिए। वक़्त आ गया है कि भारत सरकार ‘नेशनल पैलिएटिव केयर’ और गंभीर रूप से अक्षम लोगों के लिए राज्य द्वारा संचालित आश्रय गृहों की मजबूत व्यवस्था करे। यदि तथ्यात्मक आधार संदिग्ध हो, तो निर्णय की समीक्षा भी अनिवार्यतः हो। यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं है—यह उस दर्पण की तरह है जिसमें हम एक राष्ट्र के रूप में खुद को देख सकते हैं। क्या हम सुविधा के लिए निर्णय ले रहे हैं या संवेदना के आधार पर? क्या हम कानून का पालन कर रहे हैं या कानून के पीछे छिपकर नैतिक जिम्मेदारी से बच रहे हैं? अंततः, प्रश्न यही है— क्या हम एक ऐसे समाज बनना चाहते हैं जहाँ जीवन की रक्षा सर्वोच्च मूल्य हो, या ऐसा जहाँ परिस्थितियाँ तय करें कि कौन जीने योग्य है और कौन नहीं? जब तक हम जीवन की गरिमा की रक्षा नहीं कर सकते, तब तक मृत्यु की गरिमा पर बहस बेमानी है।

    Shagun

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