डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भारत भले ही राजनीतिक रूप से परतंत्र रहा, किंतु सांस्कृतिक रूप से इसे कभी गुलाम नहीं बनाया जा सका। इस दौरान विदेशी शासकों के खिलाफ निरंतर संघर्ष जारी रहा। राष्ट्र की रक्षा हमारा प्राथमिक कर्तव्य है, जो वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित रखता है। गुलामी के दौर में रानी अहिल्या बाई होलकर ने स्वतंत्र और स्वाभिमानी शासन की अनूठी मिसाल पेश की। उनका जीवन सुशासन और सनातन धर्म के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक था। परिवारवाद से दूर, उन्होंने मालवा की जनता को अपना परिवार माना और उनकी सेवा में जीवन अर्पित किया। इसीलिए उन्हें लोकमाता के रूप में अमर सम्मान मिला।
उनकी गरीब कल्याण और नारी सशक्तिकरण की योजनाएँ आधुनिक शासन के लिए प्रेरणा हैं। 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौंडी गाँव में जन्मी अहिल्या बाई का विवाह मराठा साम्राज्य के सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव से हुआ। उन्होंने 28 वर्षों तक शासन किया और महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया। सनातन आस्था के अनुरूप उन्होंने मंदिरों में विद्वानों को नियुक्त किया और काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनाथ, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी जैसे तीर्थों में मंदिरों का निर्माण करवाया।
उन्होंने कलकत्ता से बनारस तक सड़कें, बनारस में अन्नपूर्णा मंदिर, गया में विष्णु मंदिर, अनेक घाट, कुएँ और बावड़ियाँ बनवाईं। गरीबों के लिए अन्नक्षेत्र स्थापित किए और पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित की। कई युद्धों में उन्होंने अपनी सेना का नेतृत्व किया और अंग्रेजों को अपने क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने दिया। अहिल्या बाई ने विदेशी आक्रांताओं का डटकर मुकाबला किया और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। वे अपने ध्येय से कभी नहीं डिगीं।
अहिल्या बाई सभी युद्धों में अजेय रहीं। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि लोकमाता अहिल्या बाई ने सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की जो नींव रखी, वह आज ‘विकास और विरासत’ के अभियान का आधार है। स्वतंत्र भारत को अब शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है, जिसमें वैसा ही देशभक्तिपूर्ण जज्बा चाहिए।भारतीय इतिहास की शौर्य गाथाएँ राष्ट्रीय स्वाभिमान को जागृत करती हैं। अहिल्या बाई जैसे महानायकों ने विदेशी दासता से मुक्ति के लिए बलिदान दिया। आज उनके योगदान से प्रेरणा लेकर भारत सशक्त और समृद्ध बन रहा है। शिवाजी, महाराणा प्रताप और अहिल्या बाई जैसे नायकों को पाठ्यक्रमों से हटाया गया, परंतु जब नारी सशक्तिकरण की अवधारणा भी नहीं थी, तब अहिल्या बाई ने शासन, सेवा और धर्म में अनुकरणीय उदाहरण स्थापित किया। उनका योगदान काशी, अयोध्या, सोमनाथ जैसे तीर्थों के पुनरुद्धार में आज भी जीवित है।
उनके सिद्धांत और कार्यशैली आज भी प्रासंगिक हैं। गुलामी के दौर में सत्तालोलुप शासकों ने ऐसी प्रेरक हस्तियों को दबाया, जो भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन कर सकती थीं। सुशासन और निष्पक्ष न्याय से सबको सुरक्षा प्रदान करने की प्रतिबद्धता ही विरासत को सशक्त बनाती है। अहिल्या बाई ने व्यक्तिगत सुख नहीं देखा; उनके परिवार के सभी सदस्य युद्ध में शहीद हुए। फिर भी, उन्होंने स्वयं को संभाला और महिलाओं, किसानों, व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। उनकी कुशल सैन्य रणनीति के कारण वे कभी पराजित नहीं हुईं। काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार उनके बिना असंभव था।उन्होंने बिना कर बढ़ाए राजस्व को 75 लाख से सवा करोड़ तक पहुँचाया और विधवाओं को संपत्ति का अधिकार दिलाया। अहिल्या बाई का जीवन प्रेरणादायक है, और उनका शौर्य व प्रशासनिक कार्य हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
उन्होंने बिना कर बढ़ाए राजस्व को 75 लाख से सवा करोड़ तक पहुँचाया और विधवाओं को संपत्ति का अधिकार दिलाया। अहिल्या बाई का जीवन प्रेरणादायक है, और उनका शौर्य व सुशासन हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।







