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    Home»इतिहास के आईने से

    जलियांवाला बाग के जख्म को शहीद उधम सिंह ने कभी भुलाया नहीं

    ShagunBy ShagunJuly 31, 2025Updated:August 5, 2025 इतिहास के आईने से No Comments4 Mins Read
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    2025 में बीते 31 जुलाई को शहीद उधम सिंह की 78वीं पुण्यतिथि थी, है सभी को उनको याद करने का खास दिन था जो उस वीर क्रांतिकारी की अमर गाथा को याद करने का अवसर लेकर आई, जिसने जलियांवाला बाग नरसंहार के जख्मों को अपने दिल में संजोया और भारत की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उधम सिंह की कहानी न केवल स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रेरक अध्याय है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि एक आम व्यक्ति कैसे असाधारण साहस और देशभक्ति का प्रतीक बन सकता है।

    दुखों से भरा बचपन और जलियांवाला का गहरा आघात

    26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम में जन्मे उधम सिंह का प्रारंभिक जीवन कठिनाइयों से भरा था। 1901 में उनके पिता सरदार तहल सिंह और 1907 में उनकी माता नारायण कौर की मृत्यु के बाद, उधम और उनके बड़े भाई को अमृतसर के एक अनाथालय में आश्रय लेना पड़ा।

    जलियांवाला बाग का दर्द और जीवन का लक्ष्य

    शेर सिंह के नाम से जाने जाने वाले उधम सिंह का जीवन 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद हमेशा के लिए बदल गया। इस क्रूर हत्याकांड में सैकड़ों निहत्थे भारतीयों की मौत के लिए जिम्मेदार पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर को उन्होंने अपने जीवन का एकमात्र निशाना बनाया। इस घटना ने उनके मन में बदले की ऐसी आग भड़का दी, जो 21 साल बाद लंदन में जाकर शांत हुई।

    भारतीय एकता का प्रतीक नाम: राम मोहम्मद सिंह आजाद

    उधम सिंह की जिंदगी सामाजिक समरसता और भारतीय एकता का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने अपने मूल नाम शेर सिंह को छोड़कर राम मोहम्मद सिंह आजाद अपनाया, जो हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के एकजुट होने की भावना को दर्शाता था। यह नाम उनकी उस विचारधारा को प्रकट करता था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए सभी समुदायों का एक साथ आना जरूरी है। 1933 में पासपोर्ट के लिए उन्होंने उधम सिंह नाम चुना, जिसके साथ वे अमर हो गए। यह नाम परिवर्तन उनकी रणनीति और देशभक्ति का प्रतीक था।

    लंदन में साहसिक कार्रवाई
    1. उधम सिंह ने एक किताब में रिवॉल्वर छिपाकर 13 मार्च 1940 को कैक्सटन हॉल में माइकल ओ’डायर पर दो गोलियां चलाईं, जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। इस साहसी कदम के बाद उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की।
    2. ब्रिटिश अदालत में गिरफ्तारी के बाद उन्होंने दृढ़ता से कहा कि यह कृत्य उनके देशवासियों पर हुए अत्याचारों का प्रतिशोध था।
    3. 4 जून 1940 को उन्हें हत्या का दोषी ठहराया गया, और 31 जुलाई 1940 को पेंटनविले जेल में उनकी फांसी हुई। इस नन्हें कृत्य के बाद उधम सिंह ने वहां से भागने का कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि वे निर्भीकता से पुलिस के सामने खड़े रहे।
    4. ब्रिटिश अदालत में गिरफ्तारी के बाद उन्होंने बेबाकी से कहा कि उनका यह कदम जलियांवाला बाग में हुए अत्याचारों का बदला था।
    5. 4 जून 1940 को उन्हें हत्या का दोषी करार दिया गया, और 31 जुलाई 1940 को पेंटनविले जेल में उन्हें फांसी दी गई।
    उधम सिंह की अमर गाथा

    उधम सिंह का बलिदान स्वतंत्रता संग्राम का एक स्वर्णिम पन्ना है। उन्होंने जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ी और साबित किया कि एक व्यक्ति का अटूट संकल्प और देशप्रेम कितना प्रभावशाली हो सकता है। उनकी कहानी आज भी युवाओं को अन्याय के खिलाफ खड़े होने और देश के प्रति समर्पण की प्रेरणा देती है।

    वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी ने उधम सिंह और अन्य क्रांतिकारियों की लंदन से जुड़ी स्मृतियों को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। वे लिखते हैं, “मेरी इच्छा थी कि हिंदी में एक ऐसी किताब हो जो लंदन में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े स्थानों और व्यक्तियों का जिक्र करे। इसके लिए मैंने तीन साल पहले लंदन में भारतीय उच्चायोग के साथ लेखकों की एक बैठक आयोजित की थी।” उन्होंने तेजेंद्र शर्मा के प्रयासों का उल्लेख किया, जो दुर्भाग्यवश पूर्ण नहीं हो सके।

    लंदन की क्रांतिकारी स्मृतियाँ

    पंकज चतुर्वेदी ने मदनलाल ढींगरा जैसे क्रांतिकारियों से जुड़े लंदन के स्थानों, जैसे 108 लेडबरी रोड, 140 सिंक्लेयर रोड और क्वीनवुड एवेन्यू, का उल्लेख किया, जो स्वतंत्रता संग्राम की वीरतापूर्ण कहानियों को जीवंत करते हैं।

    शहीद उधम सिंह अमर रहें!

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