बदलते हालातो के बीच आखिरकार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा और फिलहाल वहां नए प्रधानमंत्री मोह्हमद यूनुस ने सत्ता की कमान संभाल ली है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार छात्र आंदोलन में करीब तीन सौ जानें जा चुकी हैं और देश भर में बेमियादी कर्फ्यू लगाना पड़ा। सरकारी नौकरियों में विवादास्पद कोटा प्रणाली खत्म करने की मांग को लेकर छात्र उग्र आंदोलन कर रहे थे। इसमें 1971 में मुक्ति संग्राम में भाग लेने वाले सैनिकों के संबंधियों के लिए नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था।
छात्रों का आरोप है कि इस व्यवस्था में पूर्व सैनिकों के नाम पर सत्तारूढ़ अवामी लीग समर्थकों को ही फायदा पहुंचाते हुए आम स्टूडेंट्स का हक मारा जा रहा है। उधर, पीएम शेख हसीना का कहना था कि प्रदर्शन के नाम पर सरकारी संपत्तियों को हानि पहुंचाने वाले छात्र नहीं, आतंकवादी हैं। रविवार की हिंसा इन्हीं छात्रों और अवामी लीग समर्थकों में हुई। अब आंदोलनकारियों का रोष चरम पर पहुंच गया और भीड़ हसीना के आवास में भी घुस गई। मामला राजनीतिक पार्टी से जुड़ा है तो कोई ताज्जुब नहीं कि इस आंदोलन को अप्रत्यक्ष रूप से विरोधी दलों का भी समर्थन मिला हो।

शेख हसीना पिछले करीब तीन दशकों से देश की राजनीति के केंद्र में रही थीं लेकिन उनके तमाम निर्णय कई बार काफी विवादास्पद भी रहे थे और उन्हें विभिन्न वर्गों की ओर से आलोचना का शिकार भी होना पड़ा था। कई लोग उन पर तानाशाही से काम करने का भी आरोप लगा रहे थे। हो सकता है कि इसमें कुछ सचाई भी हो लेकिन यह तो तय है कि एक के बाद एक चुनाव जीतते रहने पर भी उनका विरोध एक हिस्से में बढ़ रहा था और अब छात्रों के आंदोलन के नाम पर उसने संगठित रूप ले लिया और उन्हें पद छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा।
एक रिपोर्ट के अनुसार शेख हसीना अब मुस्लिम देश सऊदी अरब और यूएई जाने की कोशिश में हैं। यही नहीं फिनलैंड को भी वह विकल्प के तौर पर देख रही हैं। वह अपनी छोटी बहन शेख रिहाना के साथ भारत आई हैं और तब से यहीं बनी हुई हैं। उन्हें बुधवार को ही हिंडन एयरबेस से निकालकर किसी सुरक्षित ठिकाने पर रखा गया है।
बांग्लादेश ने लोकतांत्रिक और सैन्य तानाशाही, दोनों तरह की सत्ता देखी है। इसलिए अब यह देखने की बात होगी। कि वहां की राजनीति आगे चलकर कौन सा मोड़ लेती है।
फिलहाल बांग्लादेश के नए अंतरिम प्रधानमंत्री मुहम्मद यूनुस ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि हाल ही में इस्लामवादियों द्वारा की गई हिंसा में हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों सहित अल्पसंख्यकों पर हमला किया गया था।







