
नाहीं लऊके खेतवा में कहीं सरसो क फुलवा,
कहंवा से आई बसंत।
गोईठा ओराई गईले, पेड़वा सुखाई गईले,
केइसे रखईहें सम्मत, केइसे होई उनकर अंत।।
मरीचा, पियाज लेइ लेहलस सरसो क जगहिया।
एही साल पांच किलो, त अगली साल 10 किलो पड़ता डईया।।
खेतवा में भरी गईल बाटे जहर, फिर काहें नाहीं होई सबकर दवइया।
रोज नीचे चलल जात बाटे पानी,
काल बे-पानी होइला पर कुछ कहिह भईया।।
अब जमाना केतना बदल गईल,
गृहस्थ त छोड़ जेल से प्रेम करतड़न संत।
अब बताव ना तू हीं,
नाहीं लउके कहीं सरसो क फुलवा, कहवां से आई बसंत।।
- उपेन्द्र नाथ राय ”घुमंतू”







