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    Home»इतिहास के आईने से

    जब रूस ने भारत को नेताजी सौंपने का वादा किया था?

    ShagunBy ShagunFebruary 26, 2025Updated:August 13, 2025 इतिहास के आईने से 3 Comments4 Mins Read
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    Post Views: 5,662

    डॉ राकेश कुमार आर्य

    लाल बहादुर शास्त्री, भारत के उन गिने-चुने नेताओं में से एक हैं, जिन्हें आज भी जनमानस ‘शास्त्री जी’ कहकर श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करता है। उनका केवल 18 महीने का संक्षिप्त कार्यकाल देश के लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ गया। 1965 के भारत-पाक युद्ध में उनके नेतृत्व ने न केवल देश को विजय दिलाई, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि वह सच्चे अर्थों में माँ भारती के सपूत थे। नन्हा कद, विशाल हृदय और अदम्य साहस का प्रतीक। इस युद्ध ने 1962 में चीन के खिलाफ मिली हार की कसक को धो डाला और शास्त्री जी ने देश को गौरव का नया अध्याय दिया।

    शास्त्री जी ने अपने पूर्ववर्ती पंडित नेहरू की नीतियों की कभी आलोचना नहीं की। इसके बजाय, उन्होंने शांत और सुलझे हुए अंदाज में अपनी राह बनाई, जो उनके परिपक्व और संयमित व्यक्तित्व को दर्शाता है। युद्ध के बाद, रूस ने भारत और पाकिस्तान को ताशकंद में शांति वार्ता के लिए आमंत्रित किया।

    रूस के तत्कालीन नेता एलेक्सी कोसिगिन इस वार्ता के मध्यस्थ थे। लेकिन इसका सबसे दुखद पक्ष यह था कि शास्त्री जी को दबाव में लाकर भारत द्वारा जीते गए पाकिस्तानी क्षेत्र को लौटाने के लिए बाध्य किया गया। 10 जनवरी 1966 को हुए ताशकंद समझौते ने शास्त्री जी को गहरी ठेस पहुँचाई। वह इस फैसले से व्यथित और चिंतित थे, क्योंकि यह न केवल उनकी इच्छा के खिलाफ था, बल्कि देशवासियों की भावनाओं के भी विपरीत था।हाल ही में सासाराम, बिहार की मेरी यात्रा के दौरान, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट की स्वतंत्रता सेनानी लेफ्टिनेंट श्रीमती आशा सहाय चौधरी के बेटे श्री संजय चौधरी से भेंट हुई।

    उन्होंने शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़े कुछ अनसुलझे रहस्यों की ओर इशारा किया। संजय जी का शास्त्री जी के सबसे छोटे बेटे के साथ सहपाठी होने के कारण उनके परिवार से गहरा नाता रहा है। उन्होंने बताया कि ताशकंद वार्ता के दौरान रूस ने शास्त्री जी पर जीते हुए क्षेत्र को वापस करने का दबाव डाला। शास्त्री जी ने न चाहते हुए भी समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद, उन्होंने रात में अपने परिवार से फोन पर बात की। उनकी बेटी ने फोन उठाया, और फिर बात उनके दामाद तक पहुँची। शास्त्री जी ने पूछा, “देश का माहौल कैसा है?” दामाद ने जवाब दिया, “माहौल गर्म है। लोग जीते हुए क्षेत्र को वापस करने के फैसले से खुश नहीं हैं।”

    शास्त्री जी जनभावनाओं को समझने वाले संवेदनशील नेता थे। वह जानते थे कि देशवासी क्या चाहते हैं। युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व ने जनता की आकांक्षाओं को बल दिया था। ताशकंद समझौता उनके लिए व्यक्तिगत रूप से स्वीकार्य नहीं था, फिर भी वह मजबूरी में बंधे थे। दामाद के जवाब पर शास्त्री जी ने कहा, “कोई बात नहीं। आप लोग शांत रहें। हम यहाँ से कुछ ऐसा लेकर आ रहे हैं, जिसे देखकर पूरा देश खुशी से झूम उठेगा।”

    संजय चौधरी के अनुसार, शास्त्री जी के इस कथन को उनके परिवार ने इस तरह समझा कि रूस ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारत को सौंपने का वादा किया था। संभवतः कोसिगिन ने शास्त्री जी को यह लालच देकर समझौते पर हस्ताक्षर करवाए कि नेताजी को लौटाने से देश में खुशी की लहर दौड़ेगी और समझौते की आलोचना दब दी जा सकती है। लेकिन क्या यह वादा केवल मात्र एक भ्रमित करने वाला था?

    अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मित्रता की भी सीमाएँ होती हैं। रूस भले ही भारत का मित्र रहा हो, लेकिन स्वार्थ की राजनीति में कोई भी देश पूरी तरह भरोसेमंद नहीं होता। उस समय पश्चिमी मीडिया यह प्रचार कर रही थी कि ताशकंद वार्ता असफल हो जाएगी और रूस को मध्यस्थता का श्रेय नहीं मिलेगा। कोसिगिन पर इस वार्ता को सफल बनाने का भारी दबाव था। संभव है कि उन्होंने नेताजी को सौंपने का झूठा वादा करके शास्त्री जी से हस्ताक्षर करवाए। लेकिन जब समझौता हो गया, तो शास्त्री जी की रहस्यमयी मृत्यु ने कई सवाल खड़े कर दिए। क्या नेताजी को लौटाने से इनकार करने और उनके बारे में रहस्यों को छिपाने के लिए शास्त्री जी की हत्या की गई? क्या रूस, जापान और ब्रिटेन से जुड़े कुछ गोपनीय तथ्य सामने आने का डर था?शास्त्री जी की मृत्यु आज भी एक अनसुलझा रहस्य बनी हुई है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के हितों की रक्षा के लिए कितनी सावधानी और सतर्कता की आवश्यकता है।

    Shagun

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    3 Comments

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