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    Home»ज़रा हटके

    इंसानियत की वो मिसालें जो सरहदें और तकदीर दोनों को चुनौती देती हैं

    ShagunBy ShagunDecember 11, 2025 ज़रा हटके No Comments3 Mins Read
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    Examples of humanity that challenge both borders and destiny.
    फोटो : सोशल मीडिया से साभार
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    आज के दौर में जब खबरें ज्यादातर नफरत, राजनीति और तनाव से भरी होती हैं, तब कुछ कहानियाँ ऐसी आती हैं जो दिल को छू जाती हैं और याद दिलाती हैं कि इंसानियत अभी जिंदा है। दो ऐसी ही कहानियाँ पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर वायरल हुईं एक पाकिस्तान की 13 साल की अफसीन गुल की और दूसरी हरियाणा के एक युवा बिजनेसमैन की। दोनों में दर्द अलग था, लेकिन दोनों में उम्मीद और प्यार एक ही था।

    पहली कहानी दिल्ली के अपोलो अस्पताल के सीनियर प्लास्टिक सर्जन डॉ. राजगोपाल कृष्णन की। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की अफसीन गुल को बचपन में चोट लगी थी। गर्दन 90 डिग्री तक मुड़ गई थी। चलना, बैठना, खाना पीना सब असंभव सा हो गया था। परिवार ने हार मान ली थी, लेकिन डॉ. राजगोपाल ने नहीं मानी। बिना एक पैसा फीस लिए, चार जटिल सर्जरी कीं। आज अफसीन सीधी गर्दन करके स्कूल जा रही है, हंस रही है, जिंदगी जी रही है।

    फोटो : सोशल मीडिया से साभार

    इस मामले में कैप्टन विजय सैनी ने ठीक लिखा – ये कोई पहला मामला नहीं है। रोहिणी, कनवालजीत, आयशा, रिदा, अहमद – दर्जनों पाकिस्तानी बच्चे भारतीय डॉक्टरों के हाथों नई जिंदगी पा चुके हैं। जब पाकिस्तान में लोग मजहब के नाम पर गला काटने की बात करते हैं, तब भारत के ये डॉक्टर बिना देश-धर्म देखे बिना सिर्फ इंसानियत के नाम पर जान बचा रहे हैं। ये वो मिसालें हैं जिन पर अपना और अपने देश का सिर खुद-ब-खुद ऊँचा हो जाता है।

    फोटो : सोशल मीडिया से साभार

    दूसरी कहानी हरियाणा के सिरसा की है। एक संपन्न बिजनेसमैन गांव जा रहा था। रास्ते में बैल से टक्कर। एक्सीडेंट इतना भयानक कि एक साल तक कोमा में रहा। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। लेकिन मां-बाप और पत्नी ने जवाब नहीं दिया। पिता ने तीन किले जमीन बेच दी, पत्नी ने दिन-रात बिस्तर के पास खड़े रहकर सेवा की। साढ़े तीन साल बाद वो युवक आज न सिर्फ चलने लगा है, बल्कि उसने हरियाणा CET का पेपर भी क्लियर कर लिया है।

    ये परिवार की ताकत है। आजकल की दुनिया में जहाँ 10 दिन पति बीमार पड़े तो कुछ पत्नियाँ कहती हैं – “बेटे को संभालो, मैं जा रही हूँ”, वहीं ये महिला साढ़े तीन साल तक अपने पति को दोबारा जिंदगी लौटा रही है। ऐसे मां-बाप, ऐसी पत्नी को सलाम करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं।

    दोनों कहानियों में एक बात कॉमन है – जब बाकी सब ने हार मान ली, तब कुछ लोग नहीं माने। एक तरफ डॉक्टर थे जिन्होंने “दुश्मन मुल्क” की बच्ची को अपनी बेटी समझा, दूसरी तरफ परिवार था जिसने मौत को भी मात दे दी।

    ये कहानियाँ सिर्फ व्यक्तिगत जीत नहीं हैं। ये उस इंसानियत की जीत हैं जो न सरहद मानती है, न तकदीर। अफसीन की मुस्कान और उस हरियाणवी युवक का CET क्लियर करना हमें याद दिलाता है कि दुनिया में अभी भी फरिश्ते मौजूद हैं , कभी व्हाइट कोट में, कभी साड़ी या कुर्ते में।

    बस जरूरत है इन कहानियों को आगे बढ़ाने की। क्योंकि नफरत की आवाजें खुद-ब-खुद तेज होती हैं, लेकिन इंसानियत की कहानियों को हमें ही बुलंद करना पड़ता है।

    नमन है डॉ. राजगोपाल को। नमन है उस हरियाणवी परिवार को। और नमन है हर उस इंसान को जो दूसरों की जिंदगी में रोशनी बनकर आता है।

    इन कहानियों से बड़ा कोई राष्ट्रगान नहीं।
    इन मुस्कानों से बड़ी कोई जीत नहीं।

    Shagun

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