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    नव वर्ष सभी धर्मों का

    By January 2, 2020 Featured No Comments5 Mins Read
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    हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथों के मतानुसार जिस दिन सृष्टि के इस चक्र को प्रथम बार प्रकृति द्वारा परिवर्तित किया गया वह दिन चैत्र शुदी की प्रथम रविवार का दिन था। हिन्दू नववर्ष की शुरुआत अंग्रेजी माह के मार्च – अप्रैल में पड़ने के कारण भारत मे सभी शासकीय एवं अशासकीय कार्य तथा वित्तीय वर्ष भी अप्रैल माह यानिकि (चैत्र) मास से प्रारम्भ होता है।

    चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को इस सृष्टि का आरंभ होने की बात हमारे बड़े बुजुर्गों द्वारा एवं ऋषि मुनियों रचित धार्मिक गर्न्थो की मान्यताये है। हिन्दू कलेंडर के अनुसार नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रराम्भ होता है। इस दिन ग्रहों एवं नक्षत्रों मे परिवर्तन होने से हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होने की परंपरा वर्षो से चली आ रही है।

    इस पृथ्वी के पेड़-पोधों से लेकर फूल, मंजरी, कली खिलने एवं समस्त प्राणी जगत में नव चेतना का संचार होना इसी समय प्रारम्भ होता है, सम्पूर्ण वातावरण मे एक नविन उल्लास विखेर कर प्राणियों में प्रफुल्लित कर देता है जिससे सम्पूर्ण प्राणी जगत आह्लादित हो उठती है।

    इसी दिन सृष्टि का निर्माण हुआ था। इस प्रकति से उत्पन परम पुरूष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र मास में ही आता है। इसीलिए सम्पूर्ण पृथ्वी में सृष्टि सबसे यधिक चैत्र मास में ही महक उठती है। प्रकृति प्रदत्त इस काल मे न शीत न ग्रीष्म। सम्पूर्ण दिशाओं में सुवासित गंध से परिपूर्ण पावन काल की प्रभात वेला में सूर्य की अरुणा मयी दमकती चमकती स्वर्ण किरणें पृथ्वी के वक्षस्थल में विखेरती हुई इस धरती को धन्य करती है।

    वैसे तो परंपरागत रूप से नए वर्ष को 1 मार्च को मनाये जाने की परम्परा है लेकिन भारत की संकृति-सभ्यता के बहुत लम्बे समय तक पश्चिमी सभ्यता के आधीन वश में या कहे साथ रहने से उसकी छाप पड़ना स्वाभाविक सी बात है इस पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते प्रभाव व चलन के कारण नव वर्ष प्रति वर्ष पहली जनवरी को मनाये जाने की परम्परा की शुरुआत भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान हुआ कियूंकि कि हमारे देश मे बाहर से आये लोगों के दबाव या कहे उनके संस्कृति एवं सभ्यता को अपनाने के लिए हम बाध्य हुए या बाध्य किये जाने के उपरानत भारतीय सभ्यता एवं संस्कार धीरे-धीरे यहां के निवासियों ने छोड़ उनकी सभ्यता-संस्कृति को अपनाते चले गये जो परिपाटी आज वर्तमान समय तक वादस्तूर जारी है।

    वैसे वर्ष 2020 नये वर्ष का आगाज हो चुका है। पूरी दुनिया नये साल की खुशियां मनाकर स्वागत करती हैं। 1 जनवरी को मनाया जाने वाला नव वर्ष पूरी दुनिया मे सर्वाधिक प्रचलित है लेकिन इसके बाद भी विभिन्न धर्मों व समाजों द्वारा भिन्न-भिन्न दिनों पर नव वर्ष मनाए जाने की परंपरा पूर्व काल से चली आ रही है जो आज भी बदस्तूर जारी है। सम्पूर्ण दुनिया मे किस धर्म में नया वर्ष किस दिन मनाया जाता है और कब से नया वर्ष मनाने की परम्परा की शुरुआत हुई है यह बात हम से बहुतों को पता नही होगा।

    ईसाई धर्म में नव वर्ष :

    ईसाई धर्म समाज में पहली जनवरी को नव वर्ष मनाया जाता है। यह परम्परा लगभग 4000 वर्ष पहले बेबीलोन में नया वर्ष 21 मार्च के दिन मनाया जाता था जो कि वर्ष के आरम्भ वसंत ऋतु के आगमन की तिथि मानी जाती थी। उस वक्त रोम के तानाशाह जूलियस सीजर ने ईसा पूर्व 45वें वर्ष में जूलियन कैलेंडर की स्थापना की, उस समय विश्व में सर्व प्रथम पहली बार 1 जनवरी को नए वर्ष का उत्सव मनाया गया था उस वक्त से आज तक ईसाई धर्म के लोग इसी दिन को नव वर्ष के रूप में मनाते हैं। पूरी दुनियां में यह दिन सबसे ज्यादा प्रचलित नव वर्ष है।

    इस्लामी नववर्ष :

    यदि हम इस्लामी नववर्ष की बात करें तो इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मोहर्रम महीने की पहली तारीख को मुस्लिम धर्म समाज के लोगों का नया साल हिजरी की शुरू होता है। इस्लामी या हिजरी कैलेंडर चंद्र पर आधारित होता है, जो न केवल मुस्लिम देशों में ह8 नही बल्कि दुनियाभर के मुस्लिम समाज के लोग पूरे वर्ष पड़ने वाले इस्लामिक धार्मिक पर्वों को मनाने का सही समय जानने के लिए इसी का प्रयोग करते हैं।

    सिंधी समाज का नववर्ष:

    हमारे देश मे सिंधी लोग का नव वर्ष चेटीचंड उत्सव से प्रारम्भ होता है जो कि चैत्र शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। सिंधी समाज के मान्यताओं अनुसार इस दिन भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था भगवान झूलेलाल वरुणदेव के अवतार में हुये थे।

    सिक्ख समुदायों का नव वर्ष:

    देश के पंजाब राज्य में पंजाबी समुदाय के लोगों द्वारा नव वर्ष वैशाखी पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह दिन अप्रैल माह में आता है। सिक्ख नानकशाही कैलेंडर के अनुसार होला मोहल्ला (होली के ठीक दूसरे दिन) नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है।

    जैनियों का नव वर्ष:

    ज़ैन धर्म मे नववर्ष दीपावली के ठीक अगले दिन मनाये जाने की परंपरा है। भगवान महावीर के मोक्ष प्राप्ति के अगले दिन नव वर्ष की शुरू होती है. इसे वीर निर्वाण संवत भी कहते हैं।

    पारसी धर्मालम्बियों का नव वर्ष :

    पारसी धर्म का नया वर्ष नवरोज या नरोज के रूप में मनाया जाता है। साधारणतः यह 19 अगस्त को नवरोज का उत्सव पारसी लोगों द्वारा मनाया जाता हैं। आज से लगभग 3000 वर्ष पूर्व काल मे शाह जमशेदजी द्वारा पारसी धर्म समाज में नवरोज मनाने की परम्परा की शुरुआत की। नव अर्थात् नया और रोज का अर्थ प्रति दिन।

    हिब्रू नववर्ष :

    हिब्रू मान्यताओं के अनुसार ( हिब्रू इसराइल की धर्म जाती के लोगों की एक भाषा है। ) भगवान द्वारा सम्पूर्ण विश्व की रचना के लिये पूरे सात दिनों का वक्त लगा था। इस सात दिनों के संधान के बाद ही नया वर्ष मनाया जाता है। यह दिन ग्रेगरी कैलेंडर के अनुसार 5 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच का समय नाव वर्ष का होता है।

    प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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