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    Home»इंडिया»Gandhi Jayanti

    गांधीगिरी याद रखिए बस!

    ShagunBy ShagunSeptember 28, 2020 Gandhi Jayanti No Comments4 Mins Read
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    ज़रा याद करों कुर्बानी: गाँधी जयंती 2 अक्टूबर विशेष: 

    गाँधी लोकतंत्र की आत्मा हैं। गाँधी हमारे बीच नहीं हैं, वैसे न रहने वाले तो काफी हैं। लेकिन गाँधी और नेहरू और जिन्ना का जीवन दर्शन जिंदा है। समय समय पर उन्हें याद किया जाता है। आजकल संसद से सड़क तक गाँधीगिरी का दौर है। कहाँ उपवास तो कहाँ गाँधीगिरी चल रही है। हमें अपने लोकतंत्र पर कितना गर्व है। देखिए! बिल पर राजनीति बिलबिला रही है। सरकार बिल पर पीली है और ध्वनिमत का जयघोष कर दिया। लेकिन विपक्ष बिलबिला रहा है तो कोई बिल में घुसने को बेताब है।

    गाँधी दर्शन में सफेद परजीवियों का अटूट विश्वास है। जब टूट जाते हैं तो गाँधीगिरी पर लौट आते हैं। बापू की आत्मा अपने मुलुक की प्रौढ़ता पर कितनी गर्वित होती होगी। क्योंकि उनका उपवास, सत्याग्रह, चरखा और चिंतन, अहिंसा मंचों और भाषणों में कितना जिंदा और सुरक्षित है। अपुन के लोकतंत्र में कभी. कभी गाँधी जी के क्लोनवादी पद की तरह उभर आते हैंए जिसकी वजह से गाँधी के पेटेंटवादियों के पेट में मरोड़ उठता है। खांटी गाँधीवादी चिंता में पड़ जाते हैं।

    गाँधीवाद के उत्तराधिरियों को यह बात पचती नहीं क्योंकि गाँधीगिरी को जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। उनके विचार में जब यह जिम्मेदारी वे भलीभाँति निभा रहे होते हैं तो फिर दूसरों की क्या जरूरत। समाजशास्त्री कहते हैं कि विचार कभी मरते नहीं हैं। फिर गाँधीए नेहरू और गोडसे हमारे बीच भले जिंदा न होंए लेकिन उनके विचार जिंदा हैं। हमारे लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत और उपलब्धि है। अपन के मुलुक में लाखों लोग हर रोज मरते और पैदा होते हैंए लेकिन किसी का विचार छोड़िए यादें तक जिंदा नहीं बचती। यहीं कम क्या हैं इनकी बची हुई है। दक्षिणपंथी, वामपंथी और सेक्यूलरवादी भी उतनी ही भावभक्ति से गाँधी दर्शन को मानते हैं।

    वैसे गाँधी को याद करने के लिए दो विशेष दिवस हैं। लेकिन इसी एक में गोडसे दर्शन ने भी अतिक्रमण कर लिया है। उस दिवस विशेष पर इस तरह के वादी बिल से भराभरा कर निकल आते हैं। यह गोडसे दर्शन के सामयिक चिंतक हैं। बाकि दिनों में गाँधीवाद का ही अनुशरण करते हैं। हपारे जीन में गाँधी और गोड़से जिंदा हैं। अगर वह पर गए तो गाँधी और गोड्सेवाद पर जाएगा।

    सत्ता और सिहासन के साथ सियासत मर जाएगी! लोकतंत्र का दम निकल जाएगा। इसलिए उन्हें जिंदा रखना है। हम लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं। हमारा संविधान समता. समानता की वकालत करता है। इसलिए हम गाँधी और गोड्से में कोई फर्क नहीं रखते हैं। हमें बिल पर बवाल मंजूर नहीं। जब हम बिल पर आम सहमति चाहते हैं तो फिर मतविभाजन की क्या जरूरत। अपना का मुलुक दुनिया भर में श्यूनिटी इन डायवर्सिटी के लिए जाना जाता है और फिर बिल का मतविभाजन क्यों कराएं।

    लोग हैं कि संविधान की मूल आत्मा को समझ नहीं पाते। अब सिर फिरे विपक्ष को कौन बताए। इसीलिए हमने जनमत के बजाय ध्वनिमत का रास्ता अपनाया। यह मुलुक और संसद की विशुद्ध गाँधीगिरी है। अब यह कितनी गिरी है यह अलग बात देश के कुछ विचारवादियों का मानना है कि आत्माएँ भूत बन कर भी मंडराती हैं। जिसकी वजह से गोडसे की आत्मा हमारे लोकतंत्र में रह. रह कर हावी हो जाती है। अपनी संसद में भी बिल के खिलाफ यहीं बिलबिलाहट दिखी। माइक तोड़ी जाती है और बिल फड़े जाते हैं। जिंदा और मुर्दाबाद होते हैं। लेकिन फि गाँधीवाद शर्मशार करने लगता है।

    और बापू की आत्मा शान्ति के लिए हम प्रतिमा शरणम गच्छामि हो लेते हैं। उपास चलता है और गाँधीगिरी जिंदा हो जाती है। हम गाँधी के ऋटी भले न होंए लेकिन उनकी प्रतिमाओं का शुक्रगुजार होना चाहिए जो हमें गाँधी दर्शन की याद दिलाती है। -प्रभुनाथ शुक्ल

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