संसार का भरण पोषण करने वाला परमात्मा ही है
छत्रपति शिवाजी सामंतगढ़ किले का निर्माण करा रहे थे। हजारों मजदूर काम में लगे थे, यह देखकर शिवाजी को अहंकार आ गया कि वह इतने व्यक्तियों का पेट पालन करा रहे हैं। उसी समय समर्थगुरु रामदास भी वहां जा पहुंचे। अंतर्यामी गुरु को शिष्य की भावनाएं समझते देर न लगी।
उन्होंने शिवाजी के पास ही पड़े भारी शिलाखंड को तुड़वाने के लिए कहा। कई मजदूर लग गए। पत्थर के दो टुकड़े हो गए। बीच में एक ओखली जैसा पोला स्थान जिसमें पानी भरा था एक मेंढकी भी थी उसमें। यह देखकर समर्थ गुरु ने व्यंग्य से कहा- “वह शिवाजी पत्थर के बीच में मेंढकी के लिए आपने कितना प्रबंध किया है।”
शिवाजी अपने अहंकार की व्यर्थता को समझ गए और यह मान लिया कि संसार का भरण पोषण करने वाला परमात्मा ही है।







