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    भारत की सबसे रहस्यमय झील ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’: रहस्यों और रोमांच का अड्डा

    ShagunBy ShagunAugust 25, 2025 मानो या न मानो No Comments5 Mins Read
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    मैं पिछले सप्ताह लेक ऑफ नो रिटर्न देख कर लौटी। पता चला कि ड्रोन हमले इस झील के दक्षिण-पूर्व में 2 उल्फा (आई) शिविरों पर हुए थे। Rami Niranjan Desai,- x user
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    भारत और म्यांमार की सीमा पर बसे अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले में एक ऐसी झील है, जो अपनी खूबसूरती के साथ-साथ अपने डरावने रहस्यों के लिए भी दुनिया भर में मशहूर है। इसे ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’ या नवांग यांग के नाम से जाना जाता है। स्थानीय ताई भाषा में ‘नौंग यांग’ कहलाने वाली यह झील पंगसौ पास के पास, भारत-म्यांमार सीमा पर स्थित है। इसका नाम ही इसकी भयावहता को बयां करता है।

    कहा जाता है कि जो भी इस झील के करीब गया, वह कभी लौटकर नहीं आया। इसकी रहस्यमयी कहानियां इसे भारत का ‘बरमूडा ट्रायंगल’ बनाती हैं, जो साहसिक यात्रियों और रहस्य प्रेमियों को अपनी ओर खींचती हैं।

    झील का रहा भयावह इतिहास: विश्व युद्ध की अनसुलझी कहानियां

    ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’ की सबसे चर्चित कहानी द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) से जुड़ी है। उस समय, यह क्षेत्र लेडो रोड (स्टिलवेल रोड) के पास था, जिसे मित्र देशों ने चीन की सेनाओं को आपूर्ति पहुंचाने के लिए बनाया था। इस दौरान, मित्र देशों के कई विमान ‘द हंप’ नामक खतरनाक हवाई मार्ग से उड़ान भरते थे। कहा जाता है कि कई अमेरिकी विमान, जो दुश्मन की गोलाबारी या तकनीकी खराबी का शिकार हो गए, इस झील को समतल जमीन समझकर आपातकालीन लैंडिंग के लिए चुना। लेकिन लैंडिंग के बाद न तो विमान, न पायलट, और न ही चालक दल कभी वापस लौटे। ये विमान और उनके यात्री रहस्यमय तरीके से गायब हो गए।

    इस रहस्य को सुलझाने के लिए अमेरिकी सैनिकों की एक टुकड़ी को झील के पास भेजा गया, लेकिन उनकी कहानी भी उतनी ही रहस्यमयी है। वे सैनिक भी झील के आसपास से गायब हो गए, और उनका कोई सुराग नहीं मिला। एक अन्य कहानी जापानी सैनिकों से जुड़ी है, जो युद्ध के बाद वापस लौट रहे थे। वे रास्ता भटककर इस झील के पास पहुंचे और कथित तौर पर वहां की रेत में धंस गए, जिसके बाद उनका कोई अता-पता नहीं चला।

    फोटो : गूगल से साभार

    स्थानीय लोककथाएं और डर

    ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’ केवल ऐतिहासिक घटनाओं तक सीमित नहीं है। स्थानीय तांग्सा समुदाय और अन्य जनजातियों के बीच इस झील को लेकर कई डरावनी लोककथाएं प्रचलित हैं। कुछ का मानना है कि झील में आत्माएं निवास करती हैं, जो वहां आने वालों को अपने साथ ले जाती हैं। अन्य लोग इसे किसी अन्य आयाम का द्वार मानते हैं, जो लोगों को गायब कर देता है। स्थानीय लोग इस झील के पास जाने से डरते हैं और यहां तक कि पक्षी और जानवर भी इसके आसपास नजर नहीं आते। कहा जाता है कि झील का पानी और आसपास का दलदली क्षेत्र इतना खतरनाक है कि यह किसी को भी निगल सकता है।

    क्या है सच: मिथक या हकीकत?

    कई विशेषज्ञों का मानना है कि ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’ की कहानियां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई हैं। 2002 में इस क्षेत्र का दौरा करने वाले जॉयदीप सिरकार जैसे कुछ शोधकर्ताओं का दावा है कि झील के रहस्य को सुलझा लिया गया है, और यह केवल विश्व युद्ध की त्रासदियों और प्राकृतिक भौगोलिक परिस्थितियों का परिणाम है। झील का दलदली इलाका और घने जंगल यात्रियों के लिए खतरनाक हो सकते हैं, जिसके कारण लोग रास्ता भटककर या दलदल में फंसकर गायब हो गए होंगे।

    हालांकि, इस झील की भौगोलिक स्थिति और इतिहास इसे रहस्यमय बनाए रखते हैं। 1.4 किमी लंबी और 0.8 किमी चौड़ी यह झील पटकै पहाड़ों के बीच बसी है, जहां पहुंचना अपने आप में एक चुनौती है। कुछ का मानना है कि झील का नाम और उसकी कहानियां स्थानीय प्रशासन द्वारा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रचारित की गई हैं। फिर भी, यह सच है कि इस क्षेत्र में कई विमान और लोग गायब हुए, जिनका कोई ठोस जवाब आज तक नहीं मिला।

    पर्यटन का आकर्षण: साहसिक और रहस्यमयी यात्रा

    ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’ आज अरुणाचल प्रदेश के पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह झील नम्पोंग गांव से 12 किमी और पांगसौ पास से 2.5 किमी दूर है। भारत-म्यांमार सीमा पर हर महीने की 10, 20 और 30 तारीख को सीमा व्यापार बाजार लगता है, जहां पर्यटक इस झील को देखने के लिए आते हैं। हालांकि, मॉनसून के दौरान भूस्खलन के खतरे के कारण यात्रा से बचने की सलाह दी जाती है। भारतीय नागरिकों को अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) और विदेशी नागरिकों को रेस्ट्रिक्टेड एरिया परमिट (RAP) की आवश्यकता होती है। जनवरी में आयोजित होने वाला पांगसौ पास विंटर फेस्टिवल इस क्षेत्र की संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता को देखने का एक शानदार अवसर है।

    क्या करें, क्या न करेंयात्रा का समय: गर्मी या सर्दी के महीनों में यात्रा करें। मॉनसून में भूस्खलन का खतरा रहता है।
    कैसे पहुंचें: निकटतम हवाई अड्डा डिब्रूगढ़ (मोहनबारी) और रेलवे स्टेशन टिनसुकिया या मार्गरिटा है। वहां से स्थानीय बस या टैक्सी से नम्पोंग और फिर पांगसौ पास पहुंचा जा सकता है।

    सावधानियां: झील के पास जाने से पहले स्थानीय गाइड लें और दलदली क्षेत्रों से बचें। बिना अनुमति म्यांमार सीमा पार न करें।
    आसपास के आकर्षण: विश्व युद्ध स्मारक, नामदफा नेशनल पार्क, और स्टिलवेल रोड की यात्रा भी रोमांचक हो सकती है।

    रहस्य और रोमांच का संगम

    ‘लेक ऑफ नो रिटर्न’ अपनी रहस्यमयी कहानियों और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण साहसिक यात्रियों के लिए एक अनूठा गंतव्य है। यह झील विश्व युद्ध की त्रासदियों, स्थानीय लोककथाओं और प्राकृतिक खतरों का मिश्रण है। हालांकि कुछ इसे केवल मिथक मानते हैं, लेकिन इसका इतिहास और अनसुलझे रहस्य इसे भारत के सबसे रोमांचक स्थानों में से एक बनाते हैं। क्या आप इस ‘बरमूडा ट्रायंगल’ की सैर करने का साहस करेंगे? – प्रस्तुति : नीतू सिंह

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