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    मुकुंदरा की जंगली धड़कन: जहां बाघों की गर्जना और इंसानों की चिंता एक साथ गूंजती है

    ShagunBy ShagunDecember 11, 2025 Featured No Comments5 Mins Read
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    Mukundara hills Tiger Reserve Rajasthan
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    रचित सक्सेना

    कोटा के दक्षिण-पूर्वी इलाके में बसे मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व (एमएचटीआर) की सड़कें कभी शांत होती हैं, तो कभी एक अचानक सन्नाटे से भर जाती हैं। कल्पना कीजिए: एक धूल भरी सड़क, दोनों तरफ घने जंगल, दूर तक फैली चंबल नदी की चमक, और अचानक एक रेडियो-कॉलर वाली बाघिन ‘कनकटी’ सड़क पार करती हुई नजर आती है। आसपास के चरवाहे अपनी गाय-बछड़ों को भागा ले जाते हैं, ट्रैफिक रुक जाता है, और दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं। यह कोई फिल्म का सीन नहीं, बल्कि 9 दिसंबर 2025 को मुकुंदरा में घटी सच्ची घटना है। एनक्लोजर से ‘ब्रीफ एस्केप’ करने वाली कनकटी उसी शाम लौट आई, लेकिन इस घटना ने फिर से जंगल की खूबसूरती और उसके आसपास बसे गांवों की नाजुक जिंदगी के बीच के संघर्ष को उजागर कर दिया।

    Mukundara hills Tiger Reserve Rajasthan
    मुकुंदरा की जंगली धड़कन: जहां बाघों की गर्जना और इंसानों की चिंता एक साथ गूंजती है

    मुकुंदरा, जो राजस्थान का तीसरा टाइगर रिजर्व है, 759 वर्ग किलोमीटर में फैला एक हरा-भरा स्वर्ग है। यहां मुकुंदरा और गार्गोला नामक दो समानांतर पहाड़ियां हैं, जिनकी घाटियां चंबल, रामजान, आहू और काली नदियों से घिरी हुई हैं। जंगल इतना सघन है कि सूरज की किरणें मुश्किल से छनकर आती हैं धोक, खैर, बेर, पलाश और गुर्जन जैसे पेड़ों का साम्राज्य। वन्यजीवों की बात करें तो बाघ, तेंदुआ, स्लॉथ बियर, चीतल, सांभर, जंगली सूअर और नीलगाय यहां की शान हैं। चंबल के किनारे घड़ियाल और गंगा डॉल्फिन की झलक मिलती है, जबकि पहाड़ी इलाकों में काराकल जैसी दुर्लभ बिल्लियां छिपी रहती हैं। सर्दियों में, जब सूर्योदय के समय पहाड़ियां सुनहरी हो जाती हैं, तो यह जगह किसी चित्रकार के कैनवास जैसी लगती है। पर्यटक यहां जंगल सफारी का लुत्फ उठाते हैं, लेकिन मानसून में बंद रहने वाला यह रिजर्व अपनी प्राकृतिक सुंदरता से पर्यावरण प्रेमियों को बुलाता रहता है।

    लेकिन इस जंगल की चमक के पीछे छिपी है एक कड़वी सच्चाई मानव-वन्यजीव संघर्ष। रिजर्व के बफर जोन में बसे 20 से अधिक गांव, जैसे लक्ष्मीपुरा, खेरली बावड़ी, घाटी, मशालपुरा, दमोदरपुरा और गिरधरपुरा, जहां 5,000 से ज्यादा परिवार रहते हैं, रोज इसकी मार झेलते हैं। ये गांव मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर निर्भर हैं, लेकिन बाघों और तेंदुओं का शिकार बन जाते हैं उनके पशुधन। वन विभाग ने कुछ गांवों को रिलोकेट करने की कोशिश की है लक्ष्मीपुरा पूरी तरह स्थानांतरित हो चुका, खेरली बावड़ी और घाटी में ज्यादातर परिवार चले गए, लेकिन मशालपुरा में आधा ही सफल हुआ। बाकी गांवों में अभी चर्चाएं चल रही हैं। ग्रामीणों की शिकायत है कि मुआवजा समय पर नहीं मिलता, और जंगल के बढ़ते विस्तार से उनकी जमीनें सिकुड़ रही हैं। फिर भी, ये गांव जंगल पर निर्भर हैं लकड़ी, जड़ी-बूटियां और पर्यटन से रोजगार। सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बातें तो होती हैं, लेकिन हकीकत में ये गांव जंगल की ‘शॉक एब्जॉर्बर’ बने हुए हैं, जहां संघर्ष रोज की जिंदगी का हिस्सा है।

    वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – https://x.com/i/status/1536368024735055873

    अब आइए, कुछ रोचक और दिल दहला देने वाली घटनाओं पर नजर डालें, जो मुकुंदरा के इस द्वंद्व को जीवंत बनाती हैं:

    1. कनकटी का ‘ब्रीफ एस्केप’ (9 दिसंबर 2025): रणथंभौर से स्थानांतरित यह बाघिन, जो MT-8 या कनकटी के नाम से कुख्यात है, अपने एनक्लोजर से बाहर निकल आई। वीडियो में दिखा कि वह सड़क पार कर रही थी, जिससे ट्रैफिक रुक गया और चरवाहों ने अपनी गाय-बछड़ों को भागा लिया। कनकटी का इतिहास खतरनाक है रणथंभौर में उसके भाई-बहनों समेत तीन मानव हत्याओं से जुड़ी। वन अधिकारी मुथु एस. के मुताबिक, रेडियो-कॉलर से ट्रैकिंग की गई और वह शाम तक लौट आई। लेकिन वन्यजीव प्रेमी बृजेश विजयवर्गीय ने इसे ‘लापरवाही’ बताया, याद दिलाते हुए कि सड़कों पर वन्यजीवों की मौतें आम हैं।
    2. रणथंभौर की ‘मैन-ईटर’ कनकटी का सफर (अगस्त 2025): स्वतंत्रता दिवस पर 82 वर्ग किलोमीटर के एनक्लोजर में रिलीज हुई कनकटी ने आसपास के गांवों में दहशत फैला दी। रणथंभौर में दो मानव हत्याओं से आरोपी यह बाघिन अपनी मां एरोहेड की बीमारी के कारण शिकार सीखने में कमजोर रही, जिससे वह इंसानों के करीब आ गई। वन विभाग ने कहा कि रिलीज एरिया गांवों से दूर है, लेकिन ग्रामीणों ने पुरानी घटनाओं का हवाला देकर विरोध किया। अब एक नर बाघ और दो अन्य बाघों को लाने की योजना है, ताकि प्रजनन बढ़े।
    3. एमटी-2 का दर्दनाक अंत (2019): रणथंभौर से शिफ्ट की गई बाघिन एमटी-2 ने यहां दो शावकों को जन्म दिया, लेकिन क्षेत्रीय झगड़े में घायल होकर मर गई। उसके शरीर पर कई घाव थे, जो बाघों के बीच टर्फ वॉर की कहानी बयां करते हैं। यह घटना रिजर्व की क्षमता पर सवाल उठाती है क्या मुकुंदरा अभी तैयार नहीं? उसके प्रेमी बाघ टी-98 ने 150 किलोमीटर का सफर तय किया, लेकिन देर हो चुकी थी।
    4. पशुधन पर हमले का सिलसिला: 2023-24 में दर्जनों मामले सामने आए, जहां बाघों ने गांवों में घुसकर गाय-बकरियां शिकार कीं। एक घटना में चरवाहे ने भागकर जान बचाई, लेकिन मुआवजे की प्रक्रिया ने महीनों इंतजार करवाया। ग्रामीण कहते हैं, “जंगल हमारा है, लेकिन बाघ हमारा नहीं।”

    ये घटनाएं बताती हैं कि मुकुंदरा की खूबसूरती एक दोधारी तलवार है। एक तरफ जैव विविधता का खजाना, जो पर्यटन से गांवों को रोजगार देता है जैसे जंगल सफारी और इको-टूरिज्म। दूसरी तरफ, बिना कॉरिडोर के रणथंभौर से शिफ्ट बाघों का दबाव, जो संघर्ष बढ़ाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि गांवों का पूर्ण रिलोकेशन, सोलर-पंप वाले तालाब, और घास के मैदानों का विकास जरूरी है। वन विभाग ने वेबसाइट लॉन्च करने और स्टाफ ट्रेनिंग पर जोर दिया है, लेकिन बजट की कमी बाधा।

    वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – https://x.com/i/status/1998677124098519390

    वास्तव में मुकुंदरा हमें सिखाता है कि जंगल की ज्योति को बचाने के लिए इंसान को भी रोशनी बांटनी होगी। कनकटी जैसे बाघों को घर, और ग्रामीणों को सुरक्षा तभी यह रिजर्व सच्ची विरासत बनेगा। अगर आप यहां घूमने जाएं, तो सावधानी बरतें, लेकिन दिल से महसूस करें: यह जंगल सिर्फ बाघों का नहीं, हम सबका है। जय जंगल!

    Shagun

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