चीन भारत को ही आंखें दिखाने से बाज़ नहीं आ रहा रहा है। वह भारत के कई इलाकों को अपना बताकर वह क्या सिर्फ युद्ध उकसावे की रणनीति बना रहा है या फिर संयुक्त राष्ट्र संघ में अपनी दबंगई दिखाकर दूसरे देशों को डरा रहा है।
फिलहाल भारत उसके बहकावे में आने वाला नहीं और भारत अपने राष्ट्र की रक्षा करना अच्छी तरह से जानता है। अब भारत वह भारत नहीं रहा ! वह भारत को आंख दिखाने वालों को अच्छे से जवाब देना जानता है। चीन की इस कुटिल चालबाजी को समझते हुए हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मॉस्को में चीन को संकेतों में इस बात की व्यर्थता का बोध कराने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय स्थिरता और शांति के लिए आक्रामक तेवर खत्म करना जरूरी है। दूसरे विश्व युद्ध का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उसकी यादें दुनिया को सबक देती हैं कि एक देश का दूसरे देश पर आक्रमण सभी के लिए विनाश लाता है।
श्री सिंह की बातों के ठीक उलट चीन सीमा पर शांति बहाली चाहता ही नहीं है। उसने भारत के प्रति जो आक्रामक रुख अपना रखा है, उससे स्पष्ट है कि वह बड़े टकराव की तैयारी में है। इसीलिए भारत ने चीन को लेकर जो सख्त रवैया दिखाया है, उससे यह साफ है कि चीन की आक्रामक कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। चीन का गणित शायद यह था कि भारत को वह 1962 की तरह दबाने में कामयाब हो जाएगा लेकिन यह उसकी भूल है। भारत उस समय के मुकाबलों में तमाम मामलों को लेकर कहीं आगे बढ़ चुका है तथा यहां का नेतृत्व भी बातों का ज्यादा जमीनी हकीकत के नजदीक जाकर समझने में विश्वास रखता है।
अब चीन को जवाब देने के लिए भारत के पास तमाम विकल्प मौजूद हैं। भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है। ऐसे में बहुत सीधी सी बात है कि अगर चीन कोई आक्रामक कदम उठाता है तो नुकसान उसको भी उठाना पड़ना लाजिमी है। यही कारण है कि सीडीएस जनरल बिपित रावत ने यह संकेत दिया है कि चीन अगर बातचीत से नहीं माना तो उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला हुआ है। अब यह चीन पर है कि वह चाहता क्या है।







