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    Home»ब्लॉग

    पत्रकारिता में प्रासंगिक नारद सूत्र

    ShagunBy ShagunMay 24, 2024 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

    मीडिया का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक के साथ अब सोशल मीडिया की भी बाढ़ है। लेकिन यह सब तभी तक सार्थक है, जब तक इनके सामाजिक सरोकार भी है। इसके निर्वाह के लिए भारतीय संस्कृति के प्रति आग्रह आवश्यक है। भारत में देवर्षि नारद ने ही पत्रकारिता का प्रादुर्भाव किया था। उनके चौरासी सूत्र आधुनिक पत्रकारिता के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं। उनकी सभी बात आज की मीडिया पर न केवल लागू होती है, बल्कि उनपर अमल से मीडिया को आदर्श रूप दिया जा सकता है। लेकिन आधुनिक वामपंथी खेमे पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति की घोर अवहेलना की। उदारीकरण और वैश्वीकरण ने नया संकट पैदा किया है। ऐसे में राष्ट्रवादी पत्रकारिता के महत्व को बनाये रखने की चुनौती है। इसमें धीरे धीरे सफलता भी मिल रही है। देश इस समय आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। यह संयोग है कि इस दौरान राष्ट्रवादी विचार से प्रेरित अनेक संगठन व संस्थान भी अपना अमृत वर्ष मना रहे हैं। कुछ समय पहले विद्यार्थी परिषद द्वारा अपनी स्थापना के सात दशक होने पर ध्येय यात्रा पुस्तक का लोकार्पण नई दिल्ली में किया गया। राष्ट्र भाव की पत्रकारिता के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है। भविष्य की चुनौतियों का समाना करते हुए लोगों तक गुणवत्तापूर्ण समाचार प्रेषित करना आवश्यक है।

    भारतीयता को विशेष महत्व देते हुए सत्य, संवाद और सेवा को अपना ध्येय बनाना होगा।वर्तमान समय में पत्रकारिता कई चुनौतियों का समाना कर रही है। प्रिंट, विजुअल और डिजिटल मीडिया के साथ ही लोगों का दृष्टिकोण बदला है। इन चुनौतियों का सामना करते हुए हुए राष्ट्रवादी पत्रकारिता प्रगति करेगी। पत्रकारिता को धर्म मानकर काम करने वाले ही सफल होते है। राष्ट्रवादी पत्रकारों ने इसी विचार के अनुरूप कार्य किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आदर्श अपेक्षित हैं। उनके पालन से ही समाज व राष्ट्र का हित सुनिश्चित होता है। इन आदर्शों की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। समाचार सम्प्रेषण में स्पष्टता व गुणवत्ता रहनी चाहिए। इससे प्रामाणिकता कायम होती है। साथ ही समाज का भी कल्याण होता है। उसी के आधार पर देश का लोकतंत्र स्वस्थ बना रहेगा। देश के लोकतंत्र का स्वस्थ बने रहना समग्र विकास के लिए आवश्यक शर्त है। समाज जागरूक होकर सही दिशा में चलता है तभी लोकतंत्र सफल होता है। इसी धारणा से कार्य करना चाहिए।आज ऐसी ही ध्येयवादी पत्रकारिता की आवश्यकता है।

    आज के समय में यह भूमिका और भी अधिक बड़ी हो जाती है। आने वाले समय में भारत का सटीक और सही चित्रण विश्व पटल में रखने की बड़ी भूमिका निभानी होगी। वस्तुतः भारतीय पत्रकारिता का वामपंथी विचारों ने नुकसान किया है। इसके लिए वामपंथियों ने अपना स्वरूप भी बदला है। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार समाज की व्याख्या की थी। उसने समाज को दो वर्गों में बांटा था। पहला पूंजीपति और दूसरा सर्वहारा। पूंजीपति सदैव सर्वहारा का शोषण करता है। दोनों में संघर्ष चलता रहता है। यह वामपंथियों, मार्क्सवादियों, माओवादियों, नक्सलियों का मूल चिंतन रहा है। इसमें अनेक बदलाव भी होते रहे। भारत के वामपंथियों ने मीडिया में अपना सांस्कृतिक विचार चलाया है। इसमें मार्क्स का आर्थिक चिंतन बहुत पीछे छूट गया। पूंजीपति और सर्वहारा की बात बन्द हो गई। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों की बात करना शुरू कर दिया। लेकिन वर्ग संघर्ष के चिंतन को बनाये रखा। ये कथित प्रगतिशील पत्रकार हिन्दू और मुसलमानों के संघर्ष की रचना करने लगे। इन्होंने यह मान लिया इनका वर्ग संघर्ष चलता रहेगा।वामपंथी रुझान वाले यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सवर्ण और दलित के बीच भी वर्ग को हवा देना शुरू किया। वामपंथी रूझान की पत्रकारिता ने हिंदुओं के विरोध को अपना पैशन बना लिया। ब्रिटिश दासता के दौड़ में जुगल किशोर ने कोलकाता से हिंदी का पहला समाचार पत्र निकाला था। इसका शुभारंभ 30 मई 1826 को किया गया। इस दिन देवर्षि नारद जयंती थी। जुगल किशोर ने इस दिन के चयन दुनिया को एक संदेश देने के लिए किया था। वह बताना चाहते थे कि देवर्षि नारद ही ब्रह्मांड के प्रथम पत्रकार हैं। उनके सूत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में सदैव प्रासंगिक रहेंगे।

    लेकिन स्वतंत्रता के बाद से ही वामपंथी विचारकों को लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया। उनके द्वारा बनाये गए पाठ्यक्रम को शिक्षा में चलाया गया। इसमें भारत के प्रति हीन भावना का विचार था। प्राचीन भारतीय विरासत को खारिज किया गया। यह पढ़ाया गया कि विदेशी शासन ने भारत को सभ्य बनाया। जबकि वह स्वयं सभ्यताओं के संघर्ष करने वाले लोग थे। भारत तो सबके कल्याण की कामना करने वाला देश रहा है। देवर्षि नारद का तीनों लोकों में समान सहज संचार था। देवऋषि नारद अन्य ऋषियों, मुनियों से इस प्रकार से भिन्न हैं कि उनका कोई अपना आश्रम नहीं है।वे निरंतर प्रवास पर रहते हैं तथा उनके द्वारा प्रेरित हर घटना का परिणाम लोकहित से निकला।इसलिए वर्तमान संदर्भ में यदि नारदजी को आजतक के विश्व का सर्वश्रेष्ठ लोकसंचारक कहा गया।नारद द्वारा रचित चौरासी भक्ति सूत्रों का यदि सूक्ष्म अध्ययन करें तो केवल पत्रकारिता ही नहीं पूरे मीडिया के लिए शाश्वत सिद्धांतो का प्रतिपालन दृष्टिगत होता है। उनके द्वारा रचित भक्ति सूत्र अनुसार जाति,विद्या,रूप, कुल,धन,कार्य आदि के कारण भेद नहीं होना चाहिए। समाचारों का संवाहन ही नारद के जीवन का मुख्य कार्य था, इसलिए उन्हें आदि पत्रकार मानने में कोई संदेह नहीं है। आज के संदर्भ में इसे हम पत्रकारिता का उद्देश्य मान सकते हैं।

    समाचारों के संवाहक के रूप में नारद की सर्वाधिक विशेषता है उनका समाज हितकारी होना। पत्रकारिता का धर्म समाज हित है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर देवर्षि नारद का चित्र एवं उनके भक्ति सूत्र उकेरे गए हैं। विश्वविद्यालय के द्वार पर प्रदर्शित नारद भक्ति सूत्र बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन सूत्रों में पत्रकारिता के आधारभूत सिद्धांत शामिल हैं।
    पहले सूत्र में लिखा है-‘तल्लक्षणानि वच्यन्ते नानामतभेदात।‘ अर्थात् मतों में विभिन्नता एवं अनेकता है। ‘विचारों में विभिन्नता और उनका सम्मान’ यह पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है। इसी तरह दूसरा है- ‘तद्विहीनं जाराणामिव।‘ अर्थात् वास्तविकता (पूर्ण सत्य) की अनुपस्थिति घातक है। अकसर हम देखते हैं कि पत्रकार जल्दबाजी में आधी-अधूरी जानकारी पर समाचार बना देते हैं। उसके कितने घातक परिणाम आते हैं, सबको कल्पना है। इसलिए यह सूत्र सिखाता है कि समाचार में सत्य की अनुपस्थिति नहीं होनी चाहिए। पूर्ण जानकारी प्राप्त करके ही समाचार प्रकाशन करना चाहिए। इसी प्रकार वह कहते है कि दु:संग: सर्वथैव त्याज्य: अर्थात् जो अनुचित हैं उसका प्रतिपालन या प्रचार-प्रसार नहीं करना चाहिए। देवर्षि नारद का उद्देश्य लोक कल्याण ही रहा।

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