जी के चक्रवर्ती
अभी चंद रोज पहले देश के तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर चुके भारत रत्न, जैसे राष्ट्रीय सम्मान से नवाजे गये पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी हमारे इस भौतिक जगत को छोड़कर सदा-सदा के लिये हमारे बीच से चले गये।
प्रणव मुखर्जी एक ऐसे राजनैतिक व्यक्तित्व थे जिन्होंने हमेशा देश के राजनीति में दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर कार्य करते रहे । वे देश के एक ऐसे विद्वान राजनेता और मार्गदर्शक थे कि जिन्हें खोने का शोक कांग्रेस के और राजनैतिक क्षेत्र के लोगों के अलावा हम सभी देशवासियों को उन्हें खोने का दुःख सदैव रहेगा। उनके चाहने वाले लगभग सभी राजनीतिक दलों में मौजूद हैं। वे कांग्रेस पार्टी के संकट मोचन के रूप में दशकों तक अपनी पार्टी की सेवा करते रहे और समय- समय पर पार्टी की सरकार और पार्टी को अनेको तरह की विद्रूप स्थितिओं से बाहर निकलते रहे हैं। वैसे तो उन्हें ही प्रधानमंत्री के पद पर सत्तारुर होना था लेकिन पार्टी के लिये उन्होंने अपने कनिष्ठ सहयोगी मनमोहन सिंह जी के आधीन कार्य करने में हिचकिचाहट नही दिखाई। उनके द्वारा उनके जीवनयात्रा पर लिखी गयी एक पुस्तक “द कोलिशन इयर्स- 1996 – 2012” में स्वयं प्रणब मुखर्जी ने इस बात का खुलासा भी किया था कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।
इस तरह से लगभग 50 वर्षों के दीर्घकालीन राजनीतिक जीवन में कई उतार चढ़ाव देखने वाले प्रणव मुखर्जी देश के वित्तमंत्री, रक्षामंत्री, विदेशमंत्री आदि जैसे महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारियों को बखूबी उठाया और अंत में देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के पद को भी सुशोभित किया । देश के सर्वोच्च पद पर रहते हुये उन्होंने वर्ष 1993 को मुम्बई में बम धमाके के गुनाहगार याकूब मेनन, मुम्बई के 26/11 जैसे हमले के अपराधी अजमल कसाब और संसद पर हमले के षड्यंत्रकारी अफजल गुरू जैसे आतंकवादियों की फाँसी की सजा पर हस्ताक्षर किये।
प्रणव मुखर्जी द्वारा लिखित एक पुस्तक ‘द कोलिशन इयर्स’ बहुत चर्चा में रही इसमें उन्होंने अनेक राजनीतिक रहस्यों पर से पर्दा उठाया है। इस पुस्तक में उनके द्वारा की गई भूलों का भी पूर्ण सत्यनिष्ठा से स्वीकारोकरक्ति किया गया है। इतना ही नहीं इसी पुस्तक में अन्य राजनेताओं के महत्व पूर्ण निर्णयों को भी उन्होंने रेखांकित किया है। कुशाग्र बुद्धि के धनी प्राण मुखर्जी के विषय में ऐसा कहा जाता है कि जब श्रीमती इंदिरा गाँधी से उनका परिचय हुआ तो वे युवा प्रणव मुखर्जी से अत्यंत प्रभावित हुईं थीं तभी इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्य सभा से सांसद मनोनीत कर दिया था। उस वख्त से वे इंदिरा जी के विश्वस्त लोगों की में से एक गिने जाने लगे।
राष्ट्रपति पद पर रहते हुये वे सर्वाधिक चर्चा में उस वख्त आये जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघ शिक्षा वर्ग में उन्होंने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होंने का उन्होंने आमंत्रण स्वीकार कर लिया। संघ के कार्यक्रम में महात्मा गाँधी जी के बाद उपस्थित होने वाले वे दूसरे बड़े नेताओं में प्रणव मुखर्जी का नाम आता है। संघ शिक्षा वर्ग में दिया गया उनका भाषण राष्ट्रभक्ति और भारतीयता पर केन्द्रित था। भारतीय संस्कृति पर गर्व करने वाले और सभी देश वासियों को भारतीय होने पर गर्व करने के अनुभूति कराने के आह्वान करने वाले प्रणव मुखर्जी के चले जाने से देश के राजनीति में जो रिक्तता आई है उसे भर पाना बहुत कठिन है। वे ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व वाले व्यक्ति राजनीतिक क्षेत्र में थे कि उनके जैसा व्यक्ति विरले ही होते हैं। अपने व्यक्तित्व, कृतित्व और ज्ञान से उन्होंने देश की जो सेवा की है वह सदैव अविस्मरणीय रखेगा। देश के एक गरीब परिवार के मध्य से निकल कर आये एक साधारण व्यक्ति की असाधारण उपलब्धियां भारतीय इतिहास में सदैव स्मरण की जाती रहेंगी। आज सम्पूर्ण राष्ट्र ऐसे गरिमामयी व्यक्तित्व को शत शत नमन करता है।







