ऊदा देवी, जिनका नाम 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाओं में गर्व से लिया जाता है, एक ऐसी योद्धा थीं जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से इतिहास रचा। रानी लक्ष्मी बाई और बेगम हज़रत महल जैसे नामों के साथ, ऊदा देवी का योगदान कम ही लोगों तक पहुंच पाया है, लेकिन उनकी वीरता अविस्मरणीय है। लखनऊ के सिकंदर बाग में उन्होंने अकेले ही 30 से अधिक ब्रिटिश सैनिकों को मार गिराया, जो उनके अदम्य साहस का प्रमाण है।
लखनऊ में हुआ था जन्म
ऊदा देवी का जन्म लखनऊ में हुआ था, हालांकि उनकी जन्म तारीख के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके पति मक्का पासी, जो एक साहसी योद्धा थे, नवाब वाजिद अली शाह की सेना में भर्ती हुए। मक्का की देशभक्ति ने ऊदा को भी प्रेरित किया, और वे वाजिद अली शाह के महिला दस्ते में शामिल हो गईं। शादी के बाद उन्हें ‘जगरानी’ नाम से भी जाना गया।

1857 की क्रांति में बड़ा योगदान
1857 में जब भारत में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह चला, ऊदा देवी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 10 जून 1857 को अंग्रेजों ने अवध पर हमला किया, और मक्का पासी इस्माइलगंज की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए। इस घटना ने ऊदा के संकल्प को और मजबूत कर दिया। उन्होंने बेगम हज़रत महल के सहयोग से महिला लडाकों की एक अलग बटालियन तैयार की।

सिकंदर बाग का युद्ध
16 नवंबर 1857 को सार्जेंट काल्विन कैम्बेल की अगुआई में ब्रिटिश सेना ने सिकंदर बाग पर हमला बोला। ऊदा देवी ने पुरुष वेशभूषा धारण कर एक पीपल के पेड़ पर चढ़कर मोर्चा संभाला। उनके सटीक निशाने से दो दर्जन से अधिक ब्रिटिश सैनिक मारे गए, जिससे अंग्रेज हैरान रह गए। अंततः गोला-बारूद खत्म होने पर उन्हें गोली लगी, और वे पेड़ से नीचे गिर पड़ीं। ब्रिटिश अफसरों ने जब उनकी पहचान जानी, तो वे दंग रह गए कि यह वीरता एक महिला की थी। काल्विन कैम्बेल ने उनकी शहादत को सम्मान देते हुए हैट उतारी थी।
ऐतिहासिक स्मृति
लंदन टाइम्स के रिपोर्टर विलियम हावर्ड रसेल ने इस लड़ाई की रिपोर्ट में ऊदा की वीरता का उल्लेख किया। आज सिकंदर बाग में उनकी मूर्ति स्थापित की गई है, जो उनके बलिदान को स्मरण कराती है। ऊदा देवी के शौर्य को शत-शत नमन!







